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Navratri 2022: नवरात्रि के लिए पूजा सामग्री

Navratri 2022

हिंदी पंचाग के अनुसार साल में नवरात्रि 4 बार मनाई जाती है | दो बार गुप्त नवरात्रि और दो नवरात्रि को मुख्य रूप से मनाया जाता है | इसमें चैत्र और शारदीय मुख्य नवरात्रि हैं, जिसे देशभर में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है | नवरात्रि का मतलब है नौ रातें | नौ दिन तक चलने वाले शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है | दे

वी मां के पावन दिन का पर्व शारदीय नवरात्रि आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को 26 सितम्बर 2022 से आरंभ होगा | अक्टूबर तक चलने वाले इन दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है | अक्टूबर को धूमधाम के साथ विजयदशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा | इसी दिन दुर्गा विसर्जन भी किया जाएगा | शास्त्रों में मां दुर्गा के नौ रूपों का बखान किया गया है | नवरात्र के दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने से विशेष पुण्य मिलता है | मान्यता है कि मां दुर्गा अपने भक्तों के हर कष्ट हर लेती हैं |

इस समय अधिक मास चल रहा है | अधिक मास का समय आधे से अधिक समाप्त हो चुका है | अधिकमास लगने के कारण इस साल शारदीय नवरात्रि एक महीने की देरी से शुरू होगी | हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष पितृपक्ष के समाप्ति के बाद अगले दिन से ही शारदीय नवरात्रि शुरू होना चाहिए, लेकिन इस बार अधिक मास होने के कारण पितरों की विदाई के बाद नवरात्रि का त्योहार शुरू नहीं हो सका |

नवरात्रि के लिए पूजा सामग्री:- Navratri 2022

  • मां दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र
  • लाल चुनरी
  • आम की पत्तियां
  • चावल
  • दुर्गा सप्तशती की किताब
  • लाल कलावा
  • गंगा जल
  • चंदन
  • नारियल
  • कपूर
  • जौ के बीच
  • मिट्टी का बर्तन
  • गुलाल
  • सुपारी
  • पान के पत्ते
  • लौंग
  • इलायची पूजा थाली में जरूर रखें |
Navratri 2020

नवरात्रि में नौ रंगों का महत्व:-

नवरात्रि के समय हर दिन का एक रंग तय होता है | मान्यता है कि इन रंगों का उपयोग करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है:

  • प्रतिपदा- पीला
  • द्वितीया- हरा
  • तृतीया- भूरा
  • चतुर्थी- नारंगी
  • पंचमी- सफेद
  • षष्टी- लाल
  • सप्तमी- नीला
  • अष्टमी- गुलाबी
  • नवमी- बैंगनी

घट स्थापना की विधि:-

नवरात्रि के प्रथम दिन ही घटस्थापना की जाती है, इसे कलश स्थापना भी कहा जाता है | इसके लिए कुछ सामग्रियों की आवश्यकता होती है | आइए जानते है घटस्थापना के समय किन सामग्रियों की जरूरत पड़ेगी |

  • जल से भरा हुआ पीतल
  • चांदी, तांबा या मिट्टी का कलश
  • पानी वाला नारियल
  • रोली या कुमकुम, आम के 5 पत्ते
  • नारियल पर लपेटने के लिए लाल कपडा या चुनरी
  • लाल सूत्र/मौली
  • साबुत सुपारी, साबुत चावल और सिक्के

मां दुर्गा के धरती पर आगमन का विशेष महत्व:-

नवरात्रि पर मां दुर्गा के धरती पर आगमन का विशेष महत्व होता है | देवीभागवत पुराण के अनुसार नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा का आगमन भविष्य में होने वाली घटनाओं के संकेत के रूप में भी देखा जाता है | हर वर्ष नवरात्रि में देवी दुर्गा का आगमन अलग-अलग वाहनों में सवार होकर आती हैं और उसका अलग-अलग महत्व होता है |

माँ विंध्यवासिनी की कहानी: आस्था का चमत्कारी धाम, मिर्जापुर

विंध्यवासिनी या योगमाया माँ दुर्गा  के एक परोपकारी स्वरूप का नाम है। उनकी पहचान आदि पराशक्ति के रूप में की जाती है। उनका मंदिर उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के किनारे मिर्जापुर  से 8 किमी दूर विंध्याचल में स्थित है। एक तीर्थस्थल  हिमांचल प्रदेश  में स्थित है, जिसे बंदला माता मंदिर भी कहा जाता है। माँ विन्ध्यासिनी त्रिकोण यन्त्र पर स्थित तीन रूपों को धारण करती हैं जो की   महालक्ष्मी , महासरस्वती और महाकाली हैं। मान्यता अनुसार सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता।

माँ विंध्यवासिनी देवी को उनका नाम विंध्य पर्वत से मिला और विंध्यवासिनी नाम का शाब्दिक अर्थ है, वह विंध्य में निवास करती हैं। जैसा कि माना जाता है कि धरती पर शक्तिपीठों का निर्माण हुआ, जहां सती के शरीर के अंग गिरे थे, लेकिन विंध्याचल  वह स्थान और शक्तिपीठ है, जहां देवी ने अपने जन्म के बाद निवास करने के लिए चुना था।

माँ विंध्यवासिनी का जन्म :

श्रीमद्भागवत पुराण की कथा अनुसार  देवकी के आठवें गर्भ से जन्में श्री कृष्ण को वसुदेवजी ने कंस से बचाने के लिए रातोंरात यमुना नदी  को पार कर गोकुल में नंदजी  के घर पहुंचा दिया था तथा वहां यशोदा  के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं आदि पराशक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा के जेल में ले आए थे। बाद में जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला तो वह कारागार में पहुंचा। उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर पटककर जैसे ही मारना चाहा, वह कन्या अचानक कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुंच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित कर कंस के वध की भविष्यवाणी की और अंत में वह भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई।

पौराणिक मान्यताएँ :

भगवती विंध्यवासिनी आद्या महाशक्ति हैं। विन्ध्याचल सदा से उनका निवास-स्थान रहा है। जगदम्बा की नित्य उपस्थिति ने विंध्यगिरिको जाग्रत शक्तिपीठ बना दिया है। महाभारत  के विराट पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं- विन्ध्येचैवनग-श्रेष्ठे तवस्थानंहि शाश्वतम्। हे माता! पर्वतों में श्रेष्ठ विंध्याचल पर आप सदैव विराजमान रहती हैं।पद्यपुराण  में विंध्याचल-निवासिनी इन महाशक्ति को विंध्यवासिनी के नाम से संबंधित किया गया है- विन्ध्येविन्ध्याधिवासिनी।

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श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में कथा आती है, सृष्टिकर्ता ब्रम्हाजी ने जब सबसे पहले अपने मन से स्वायम्भुवमनु और शतरूपा को उत्पन्न किया। तब विवाह करने के उपरान्त स्वायम्भुव मनु ने अपने हाथों से देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षो तक कठोर तप किया। उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवती ने उन्हें निष्कण्टक राज्य, वंश-वृद्धि एवं परम पद पाने का आशीर्वाद दिया। वर देने के बाद महादेवी विंध्याचलपर्वत पर चली गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि के प्रारंभ से ही विंध्यवासिनी की पूजा होती रही है। सृष्टि का विस्तार उनके ही शुभाशीषसे हुआ।

शास्त्रों में मां विंध्यवासिनी के ऐतिहासिक महात्म्य का अलग-अलग वर्णन मिलता है। शिव पुराण  में मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी (नन्द बाबा  की पुत्री) कहा गया है। मां के अन्य नाम कृष्णानुजा, वनदुर्गा भी शास्त्रों में वर्णित हैं । इस महाशक्तिपीठ में वैदिक तथा वाम मार्ग विधि से पूजन होता है। शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि आदिशक्ति  देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं, विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है|

मिर्जापुर:

भारत को मंदिरों का देश कहा जाता है. इस देश में कई मंदिर ऐसे हैं जो अपनी भव्यता और सुंदरता के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं. इनमें से कई मंदिर तो सदियों पुराने हैं. शासक बदले, साम्राज्य बदला पर ये मंदिर उसी स्थान पर पूरी भव्यता के साथ खड़े रहे . इन्हीं में से एक है यूपी के मिर्जापुर में बना मां विंध्यवासिनी का मंदिर |

विंध्याचल की पहाड़ियों में बना है मां विंध्यवासिनी का मंदिर :

माँ विंध्यवासिनी की कहानी

पूर्वांचल में गंगा नदी के किनारे बसे मिर्ज़ापुर से 8 किमी दूर विंध्याचल की पहाड़ियों में मां विंध्यवासिनी का मंदिर है. मां विंध्यवासिनी का दरबार 51 शक्तिपीठों में से एक है

विंध्यवासिनी मंदिर को जागृत पीठ भी कहा गया है:

उत्तर प्रदेश का विंध्यवासिनी मंदिर, जिसे जागृत शक्तिपीठ भी माना जाता है. शिव पुराण में मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है. मां के अन्य नाम कृष्णानुजा, वनदुर्गा भी शास्त्रों में वर्णित हैं. शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं. विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं . शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है.

धर्मग्रंथों में दर्ज है मां विंध्यवासिनी की महिमा :

यहां साल के दोनों नवरात्रों में देश के कोने-कोने से यहां लाखों श्रद्धालु आते हैं. विध्यवासिनी मां की महिमा का उल्लेख धर्म ग्रंथों में मिलता है. जो त्रिकोण यन्त्र पर स्थित तीन रूपों को धारण करती हैं जो की महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली हैं. मिर्जापुर के विंध्‍य पर्वत पर बसी मां विंध्‍यवासिनी के दरबार की महिमा अपरंपार है. महाभारत हो या पद्मपुराण,  हर जगह मां के इस स्वरूप का वर्णन मिलता है. मान्यता है कि मां के ही आर्शीवाद से इस सृष्टि का विस्तार हुआ है. आदिशक्ति जगत जननी मां विन्ध्यवासिनी चमत्कार की ढेरों कहानियां अपने अंदर समेटे हुए हैं |

भक्तों को तीन रूपों में मिलता है दर्शन :

मां विन्ध्यवासिनी  एक-दो नहीं, बल्कि तीन रुपों में भक्तों को दर्शन देती हैं. पहला मां विन्ध्यवासिनी, दूसरा मां काली और तीसरा मां सरस्वती, जिन्हें अष्टभुजा के रुप में भी जाना जाता है. खास बात यह है कि मां के तीनों रुप एक त्रिकोण पर विराजमान है, जिनकी परिक्रमा  व विधि-विधान से पूजा कर लेने मात्र से भक्त न सिर्फ मोक्ष को प्राप्त होता है बल्कि लौकिक व अलौकिक सुखों को भोगता है. मंदिर पसिसर में ही स्थित हवन कुंड बारहों महीने अखंड ज्योति के रुप में जलता रहता है. मान्यता है कि यहां आने वाले लोगों के असंभव कार्य भी मां विंध्यवासिनी के दर्शन से पूरे हो जाते हैं. 

मां विंध्यवासिनी के दरबार में होती हैं 4 आरतियां :

विंध्याचल में मां विध्यावासनी की चार आरती सभी भक्तों की हर मनोकामना को पूर्ण करती है. माना जाता है कि बारह शक्ति पीठ में मां विन्ध्वासनी की चार आरती होती है. जबकि अन्य सभी पीठ में तीन आरती ही होती है. कहा जाता है मां विंध्यवासनी की होने वाली चारों आरती का अपना अलग ही महत्व है.. मां के इस चारों आरती के दर्शन करते ही सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है.  मां की होने वाली चारों आरती का स्वरूप अलग -अलग होता है. जिसमें मंगला आरती, दरबार आरती, राजश्री आरती और देव आरती है. इन चारों आरती के दर्शन करने के अलग-अलग महत्व है. आरती के समय मंदिर के कपाट बंद होने के कारण भक्तों को इसका दर्शन नहीं हो पाता |

कैसे पहुंचें यहाँ :

बाय एयर :

सबसे निकटतम हवाई अड्डा लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है, बाबतपुर में, वाराणसी, उत्तर प्रदेश, जो लगभग माही विंध्यवासिनी मंदिर, विंध्याचल से लगभग 72 किलोमीटर हैं।

ट्रेन द्वारा :

नजदीकी रेलवे स्टेशन ‘विंध्याचल’ (भारतीय रेलवे कोड-बीडीएल) है, लगभग एक किलोमीटर मा विंध्यवासिनी मंदिर, विंध्याचल से है। ‘विंध्याचल’ रेलवे स्टेशन बहुत व्यस्त दिल्ली-हावड़ा मार्ग और मुंबई-हावड़ा मार्ग पर स्थित है। हालांकि सभी नहीं, लेकिन उचित ट्रेनों की संख्या ‘विंध्याचल’ रेलवे स्टेशन पर रुकती है। ट्रेनों के अधिक विकल्पों के लिए, रेलवे स्टेशन ‘मिर्जापुर’ (भारतीय रेलवे कोड-एमजेडपी) चुनें, मा विंध्यवासिनी मंदिर, विंध्याचल से लगभग नौ किलोमीटर।

सड़क के द्वारा :

सड़क से विंध्याचल तक पहुंचने का सबसे सुविधाजनक तरीका राष्ट्रीय राजमार्ग 2 (एनएच 2) के माध्यम से है, जिसे दिल्ली-कोलकाता रोड के रूप में जाना जाता है। नेशनल हाईवे 2 (एनएच 2) रोड पर, जो एशियाई राजमार्ग 1 (एएच 1) का संयोग है, गोपीगंज या औरई में, इलाहाबाद और वाराणसी के बीच दोनों जगहों पर, पवित्र नदी गंगा पार करने के बाद, शास्त्री पुल के माध्यम से, राज्य राजमार्ग 5 के माध्यम से, आप आसानी से विंध्याचल तक पहुंच सकते हैं

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Ashok Gehlot कौन हैं? यहाँ जाने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए लड़ने वाले अशोक गहलोत के बारे में (Congress presidential election 2022)

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने घोषणा की कि वह कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ेंगे, पार्टी कार्यकर्ता और सचिन पायलट के निर्वाचन क्षेत्र टोंक के लोग उत्साहित हैं कि उन्हें राज्य का नेतृत्व करने के लिए उनका लंबा इंतजार जल्द ही एक वास्तविकता होगी। दूसरी ओर, गहलोत के गृहनगर जोधपुर में कई लोग चाहते हैं कि वह कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद भी मुख्यमंत्री बने रहें। पार्टी अध्यक्ष का चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के बीच यह घटनाक्रम सामने आया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राजस्थान के प्रभारी महासचिव अजय माकन के साथ मल्लिकार्जुन खड़गे को पर्यवेक्षक नियुक्त किया है।अशोक गहलोत दिसंबर 1998 से 2003 और 2008 से 2013 तक और फिर 17 दिसंबर, 2018 तक इस पद पर रहे। वह राजस्थान विधान सभा के सदस्य के रूप में जोधपुर के सरदारपुरा निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह मार्च 2018 से 23 जनवरी, 2019 तक संगठनों और प्रशिक्षण के प्रभारी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव थे। 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान उन्हें गुजरात राज्य का प्रभारी भी बनाया गया था।

Ashok Gehlot

अशोक गहलोत कौन हैं –

अशोक गहलोत का जन्म 3 मई 1951 को राजस्थान के जोधपुर में एक हिंदू परिवार में हुआ था। जहां तक अशोक गहलोत की जाति का सवाल है तो बता दें कि अशोक गहलोत माली जाति से संबंध रखते हैं, जिनका राजस्थान की राजनीति में ज्यादा दबदबा नहीं है। इसके बावजूद अशोक गहलोत ने जाति की राजनीति के मिथक को तोड़ा और 3 बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने। अशोक गहलोत के परिवार में अशोक गहलोत के पिता का नाम लक्ष्मण सिंह गहलोत था। अशोक गहलोत की पत्नी का नाम सुनीता गहलोत है। अशोक गहलोत और सुनीता गहलोत की शादी 27 नवंबर 1977 को हुई थी। अशोक गहलोत के बेटे का नाम वैभव गहलोत है। वैभव भी राजनीति में हैं। अशोक गहलोत की बेटी का नाम सोनिया है।
अशोक गहलोत ने अपनी शिक्षा राजस्थान के जोधपुर विश्वविद्यालय से पूरी की है। अशोक गहलोत ने स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद विज्ञान और कानून में स्नातक किया। इसके बाद अशोक गहलोत ने अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की शिक्षा ली है।

उन्होंने कई बार केंद्रीय मंत्री के रूप में भी कार्य किया हैं | वह जोधपुर संसदीय क्षेत्र से वर्ष 1980 में 7वीं लोकसभा के लिए पहली बार चुने गए थे | उन्होंने 8वीं, 10वीं, 11वीं और 12वीं लोकसभा में जोधपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया | वर्ष 1999 में उन्हें सरदारपुरा (जोधपुर) विधानसभा क्षेत्र से विधायक के रूप में निर्वाचित किया गया था | उन्होंने लगातार तीन विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की थी |वर्ष 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के दौरान, गेहलोत ने बंगाल और पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिलों, सहित कई स्थानों पर शरणार्थी शिविरों में सेवा की | वह सेवाग्राम, इंदौर, औरंगाबाद, और वर्धा में तरुण शांति सेना द्वारा आयोजित शिविरों में सक्रिय पार्टी सिपेंट थे | 

अशोक गहलोत को राजनीति का जादूगर क्यों कहा जाता है?

दरअसल अशोक गहलोत के पिता लक्ष्मण सिंह एक महान जादूगर थे। वह देश भर में घूम-घूम कर जादू दिखाता था। अशोक गहलोत भी अपने पिता के साथ घूमते रहे और कई चरणों में जादू भी दिखाया। राजनीति में आने के बाद अशोक गहलोत ने जिस तरह से सफलता हासिल की, उसे देखकर उन्हें राजनीति का जादूगर कहा जाने लगा।

अशोक गेहलोत का राजनीतिक सफर

  • वर्ष 1979 में, उन्हें जोधपुर शहर से जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था |
  • वर्ष 1980 में वह जोधपुर संसदीय क्षेत्र से 7वीं लोकसभा के लिए चुने गए और 8वीं, 10वीं, 11वीं और 12वीं लोकसभा में जोधपुर निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था |
  • वर्ष 1980 में, उन्हें लोक लेखा समिति के सदस्य के रूप में चुना गया था |
  • वर्ष 1982 में, उन्हें राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव के रूप में नियुक्त किया गया था |
  • वर्ष 1982 में, उन्हें केंद्रीय उप मंत्री, पर्यटन विभाग के रूप में नियुक्त किया गया था |
  • वर्ष 1983 में, उन्हें पर्यटन और नागरिक उड्डयन विभाग के केंद्रीय उप मंत्री के रूप में चुना गया था  |
  • वर्ष 1984 में, उन्हें खेल विभाग के केंद्रीय उप मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया था |
  • वर्ष 1985, 1994, 1997 में, उन्हें राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष
    के रूप में चुना गया था  |
  • वर्ष 1991 में, उन्हें संचार (लोकसभा) की परामर्श समिति के सदस्य के रूप में चुना गया 
    था  |
  • वर्ष 1991 में, वह रेलवे (10वीं और 11वीं लोकसभा) की स्थायी समिति के सदस्य बने |
  • वर्ष 1998 में, वह पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने |
  • वर्ष 1999 में, उन्हें सरदारपुरा (जोधपुर) विधानसभा क्षेत्र से विधायक के रूप में चुना गया |
  • वर्ष 2008 में, वह दूसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने |
  • वर्ष 2017 में, उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव के रूप में नियुक्त किया गया

अशोक गेहलोत से जुड़े विवाद

वर्ष 2017 में, वह विवादों में तब आए जब उनका नाम paradise paper घोटाले में आया, जिसकी जाँच International consortium द्वारा की जा रही थी | हालांकि, उन्हें बाद में आरोपों से मुक्त कर दिया गया, क्योंकि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिल पाया था | वर्ष 2011 में, अशोक गहलोत को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा जब राजस्थान सरकार ने अशोक के परिवार के सदस्यों की वित्तीय संबंध रखने वाली firms को कथित रूप से ₹11,000 करोड़ की संपत्ति और अनुबंध होने के कारण |

अशोक गेहलोत से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

Interesting facts of Ashok Gehlot
  • वह महात्मा गांधी जी के आदर्शों से बहुत प्रेरित हैं |
  • वर्ष 1971 में, उन्होंने बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के दौरान शरणार्थी शिविरों में बहुत सेवा की |
  • अपने कॉलेज के दिनों से ही वह राजनीति में सक्रिय रहे हैं | वर्ष 1973 से 1979 तक वह कांग्रेस पार्टी, NSUI के युवा wing के अध्यक्ष भी रहे हैं |
  • इंदिरा गांधी ने गहलोत के संगठनात्मक कौशल को देख कर ही उन्हें राष्ट्रीय छात्र संघ के पहले राज्य अध्यक्ष नियुक्त करने का फैसला किया था |
  • उन्होंने इंदौर, सेवाग्राम, औरंगाबाद और वर्धा में तरुण शांति सेना द्वारा आयोजित शिविरों में भी काम किया है |
  • वह राजस्थान विधानसभा के सदस्य के रूप में जोधपुर के सरदारपुरा निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं |
  • वर्ष 1989 में कुछ समय के लिए उन्होंने राजस्थान के गृहमंत्री के रूप में भी कार्यभार संभाला |
  • वर्ष 1998 से 2003 तक पहली बार अशोक गहलोत राजस्थान के मुख्यमंत्री बने और मुख्यमंत्री के ररूप में उनका दूसरा कार्यकाल वर्ष 2008 से 2013 तक रहा |
  • ने भारत सेवा संस्थान की स्थापना की, जो Rajiv Gandhi Memorial book bank के माध्यम से मुफ्त पुस्तकें प्रदान करता है और ambulence सेवाएं भी प्रदान करता है |

EPFO: PF Withdrawal के लिए ऑनलाइन आवेदन कैसे करें|

  • PF Withdrawal के लिए ऑनलाइन आवेदन- EPF अकाउंट से पैसा निकालने के लिए आवेदन तभी किया जा सकता है जब आप बेरोज़गार हो जाएं या रिटायर हो जाएं। बेरोज़गार होने के 1 महीने बाद EPF अकाउंट से 75% पैसा निकाला जा सकता है और उसके 1 महीने बाद बाकि का 25% भी। आप पैसा निकालने के लिए क्लेम ऑनलाइन EPF विथड्रौल फॉर्म भर कर सकते हैं। लेकिन आप ऑनलाइन आवेदन तभी कर सकते हैं जब आपका आधार आपके UAN के साथ लिंक होगा।

What is UAN (Universal Account Number)?

UAN का पूरा नाम Universal Account Number .यह एक यूनिक नंबर है जिसकी सहायता से कोई भी व्यक्ति अपने EPF Account को ऑनलाइन संचालित कर सकते है और EPF में UAN लॉगिन कर सकते है | यूनिवर्सल एकाउंट नंबर (UAN) नौकरी करने वाले सभी लोगों को ईपीएफओ (EPFO) द्वारा जारी किया जाता है. यह 12 डिजिट का कॉमन नंबर होता है. इस एकाउंट नंबर (Account Number) द्वारा कर्मचारियों को प्रॉविडेंट फंड (PF) के बारे में जानकारी मिलती है.

ईपीएफ (EPF) के सभी मेंबर्स को उनकी सेवाओं के दौरान यूएएन (UAN) जारी किया जाता है. यूएएन 12 अंको का होता है जो ईपीएफओ द्वारा जारी किया जाता है. आप चाहे जितनी ही नौकरियां बदलें, लेकिन यूएएन वही रहता है. ईपीएएफओ का नया मेंबर बनने पर सभी को यूएएन नंबर जारी किया जाता है.

UAN (Universal Account Number) Activate होना क्यों ज़रूरी है?

UAN activate नहीं होने से कर्मचारी को बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है जैसे क़ि आपके खाते में कितने पैसे है इसकी जानकारी नहीं मिल पाती है।
जो लोग कम्पनियो ,हॉस्पिटल्स ,,स्कूल आदि में काम करते है तो कर्मचारी भविष्य निधि के तहत उनकी महीने की आय में से कुछ हिस्से को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जाता है | यह काम कंपनी के HR डिपार्टमेंट का होता है HR Department आपका EPF Account खोलेगा और UAN नंबर और पासवर्ड आपको प्रदान करेगा | आज के समय में यह पूरे भारत में लागू कर दिया गया है |
UAN NUMBER के ज़रिये आप अपनी EPF की राशि की भी जानकारी प्राप्त कर सकते है और आपके खाते में कितने पैसे है इसका भी पता कर सकते है जिसके लिए UAN का activate होना बहुत ही आवश्यक है

PF Withdrawal के लिए ऑनलाइन आवेदन कैसे करें?

PF Withdrawal के लिए ऑनलाइन आवेदन करने के लिए नीचे दिए गए स्टेप्स को फॉलो करना होगा| अतः आप सभी लोग आर्टिकल को अंत तक पूरा पढ़े|

STEP 1: सर्वप्रथम आप को मेंबर पोर्टल की ऑफिसियल वेबसाइट पर जाना होगा|

PF Withdrawal के लिए ऑनलाइन आवेदन

STEP 2: UAN नंबर और पासवर्ड की मदद से UAN सदस्य पोर्टल पर लॉग-इन करें

STEP 3: फिर ‘Online Services’ टैब पर क्लिक करें और ड्रॉप डाउन मेन्यू से ‘Claim (Form-31, 19 & 10C)’ को चुनें|

PF Withdrawal के लिए ऑनलाइन आवेदन

STEP 4: सदस्य की जानकारी स्क्रीन पर आ जाएगी। अपने बैंक अकाउंट नंबर एंटर करे और ‘Verify’ पर क्लिक करें|

PF Withdrawal के लिए ऑनलाइन आवेदन

STEP 5: इसे आगे बढ़ाने के लिए ‘Yes’ पर क्लिक करें

STEP 6: अब ‘Proceed For Online Claim’ विकल्प पर क्लिक करें |

PF Withdrawal के लिए ऑनलाइन आवेदन

STEP 7: यहाँ से फॉर्म का नया भाग खुलेगा जहां आपको ये जानकारी देनी होगी, उद्देश्य जिसके लिए पैसा निकाला जा रहा है, कितना अमाउंट निकालना है और साथ ही कर्मचारी का पता भी एंटर करे |

STEP 8: सर्टिफिकेशन पर टिक करें और आवेदन जमा करें|

STEP 9: आप पैसे निकालने के लिए जो उद्देश्य बताएंगें उस से सम्बंधित स्कैन दस्तावेज आपको जमा करने होंगें और साथ ही बैंक पासबुक को भी स्कैन करके अपलोड करना होगा|

STEP 10: EPFO में रजिस्टर्ड आपके मोबाइल नंबर पर एक सूचना भेजी जाएगी। जब आवेदन की प्रकिर्या पूरी हो जाएगी, तो पैसा आपके बैंक अकाउंट में आ जाएगा। आमतौर पर पैसा 15 से 20 दिनों में बैंक अकाउंट में आ जाता है, हालाँकि, EPFO ने अपनी और से कोई समय सीमा नहीं दी हुई है।

PF खाते से राशि निकलने के लिए शर्तें :

  • पैसा सिर्फ रिटायर्मेंट के बाद निकाला जा सकता है। EPFO रिटायर्मेंट तभी मानता है जब व्यक्ति की उम्र 55 वर्ष से ज़्यादा हो जाए।
  • EPF खाते से राशि निकालने की अनुमति केवल मेडिकल आपातकाल, घर खरीदने या निर्माण या उच्च शिक्षा के मामले में है|
  • EPFO रिटायर्मेंट से 1 वर्ष पहले 90% राशि निकालने की अनुमति देता है|
  • EPF खाते से पूरी राशि निकाली जा सकती है अगर कर्मचारी रिटायर्मेंट से पहले बेरोज़गारी का सामना करता है|
  • नए नियम के अनुसार, बेरोज़गारी के 1 महीने के बाद केवल 75% फण्ड को निकाला जा सकता है। शेष को रोज़गार प्राप्त करने के बाद नए EPF खाते में ट्रान्सफर कर दिया जाएगा|

ऑनलाइन क्लेम करते समय, आपके पास होना चाहिए:

  • एक्टिव UAN नंबर और पासवर्ड
  • बैंक जानकारी जो UAN के साथ जुड़ा हुआ है
  • पैन और आधार जानकारी जो EPF डेटाबेस में शामिल हो|

EPF विथड्रौल फॉर्म :

पैसा निकालने के लिए ऑनलाइन आवेदन करते समय, आपको तीन EPF विथड्रौल फॉर्म मिलेंगें।

  • PF एडवांस (फॉर्म- 31)
  • ऑनली PF विथड्रौल- फॉर्म 19
  • ऑनली पेंशन विथड्रौल- फॉर्म 10सी

EPF क्लेम स्टेटस :

EPF अकाउंट से पैसा निकालने के आवेदन की स्तिथि EPF मेंबर पोर्टल पर देख सकते हैं। आपको पोर्टल पर लॉग-इन करना होगा और  ‘Online Services’ सेक्शन में ‘Track Claim Status’ को चुनना होगा। आपको इसके लिए कोई अन्य नंबर नहीं देना होगा। स्तिथि स्वतः डिस्प्ले होंगे लगेगी।

EPFO - MEMBER e-SEWA की Official वेबसाइट में जाने के लिए यहाँ क्लिक करे।
EPFO की ऑफिसियल वेबसाइट में जाने के लिए क्लिक करे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न :

1. अगर यूएएन पोर्टल पर Claim Settled दिखाई दे रहा है, इसका क्या मतलब है?

जब आप अपने बैंक अकाउंट में पीएफ राशि जमा करने या पीएफ खाते से पैसे अपने बैंक अकाउंट में ट्रांसफर करने के लिए क्लेम फॉर्म के ज़रिए क्लेम कर सकते हैं, तो पीएफ ऑफिसर क्लेम को चेक करता है, उसे मंज़ूर करता है और उसके बाद ही पैसा जमा किया जाता है

2. पीएफ का पासवर्ड कैसे निकाले?

स्टेप 1: UAN Portal खोलिए। …
Sign In बटन के नीचे मौजूद Forgot Password लिंक पर क्लिक करिए
स्टेप 2: स्क्रीन पर दिख रहे खाली बॉक्सों में अपना UAN नंबर और कैप्चा (Captcha) भरिए
स्टेप 3: अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर OTP (वन टाइम पासवर्ड) मंगाइए।

3. नौकरी छोड़ने के बाद पीएफ कैसे निकाले?

मौजूदा नियमों के तहत अगर कर्मचारी 55 साल की उम्र में रिटायर (Retirement) होता है और उसके 36 महीने के भीतर जमा रकम निकालने के लिए आवेदन नहीं करता है तो पीएफ अकाउंट निष्क्रिय होगा. आसान शब्‍दों में समझें तो कंपनी छोड़ने के बाद भी पीएफ अकाउंट पर ब्याज मिलता रहेगा और 55 साल की उम्र तक निष्क्रिय नहीं होगा

3. PF पर कितना ब्याज मिलता है?

कंपनी/ नियोक्ता भी कर्मचारी के अकाउंट में 12% का ही योगदान करता है जिसका 8.33% हिस्सा ईपीएस में और 3.67% हिस्सा ईपीएफ में जाता है। EPF अकाउंट में जमा राशि पर ब्याज मिलता है, इस लेख में हम बताएंगें कि वो ब्याज कितना है और कैसे कैलकुलेट होता है। ये भी पढ़ें: EPF अकाउंट से पैसे कैसे निकालें?

4. कर्मचारी पेंशन योजना क्या है?

जब कोई कर्मचारी कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) का सदस्य बन जाता है, तो वह भी EPS का सदस्य बन जाता है. … लेकिन, नियोक्ता के योगदान का एक हिस्सा ईपीएस यानी कर्मचारी पेंशन योजना में जमा होता है. ईपीएस में मूल वेतन का योगदान 8.33% है. हालांकि, पेंशन योग्य वेतन की अधिकतम सीमा 15,000 रुपये है|

5. नौकरी छोड़ने के कितने दिन बाद पीएफ का पैसा निकाल सकते हैं?

दरअसल, ऐसा तय अवधि तक ही होता है. बता दें कि नौकरी छोड़ने के बाद पहले 36 महीने तक कोई सहयोग राशि (Contribution) जमा नहीं होने पर ईपीएफ अकाउंट निष्क्रिय खाते (In Operative Account) की श्रेणी में डाल दिया जाता है. ऐसे में आपको अपना खाता एक्टिव रखने के लिए कुछ रकम 3 साल से पहले निकाल लेनी चाहिए

6. पेंशन में कितनी बढ़ोतरी हुई?

यह बढ़ी हुई पेंशन पहली दिसम्बर 2021 से लागू होगी। इन लाभार्थियों के बैंक खातों में हर तिमाही पेंशन की राशि भेजी जाती है। इसके साथ ही कुष्ठ रोगियों की पेंशन में भी पांच सौ रुपये की बढ़ोत्तरी की गयी है। अब उन्हें 2500 रुपये मासिक के बजाए 3000 रुपये पेंशन मिलेगी।

7. पीएफ विद्ड्रॉल के लिए कैसे भरें ऑनलाइन फॉर्म?

https://unifiedportal-mem.epfindia.gov.in/memberinterface/ ,यहां अपना UAN और पासवर्ड डालकर लॉग इन करें। स्टेप 2: इसके बाद ऑनलाइन सर्विसेज ऑप्शन पर क्लिक करें.

अधिक जानकारी प्राप्त करने कि लिए आवेदक हमारी वेबसाइट http://enterhindi.com/की मदद ले सकते है |

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Shardiya Navratri 2022 Day 1: नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा कैसे करें ?

Shardiya Navratri 2022 Day 1

हिंदी पंचाग के अनुसार साल में नवरात्रि 4 बार मनाई जाती है | दो बार गुप्त नवरात्रि और दो नवरात्रि को मुख्य रूप से मनाया जाता है | इसमें चैत्र और शारदीय मुख्य नवरात्रि हैं, जिसे देशभर में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है | नवरात्रि का मतलब है नौ रातें | नौ दिन तक चलने वाले शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है | दे

वी मां के पावन 9 दिन का पर्व शारदीय नवरात्रि आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को 26 सितम्बर 2022 से आरंभ होगा | 4 अक्टूबर तक चलने वाले इन दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है | 5 अक्टूबर को धूमधाम के साथ विजयदशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा | इसी दिन दुर्गा विसर्जन भी किया जाएगा | शास्त्रों में मां दुर्गा के नौ रूपों का बखान किया गया है | नवरात्र के दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने से विशेष पुण्य मिलता है | मान्यता है कि मां दुर्गा अपने भक्तों के हर कष्ट हर लेती हैं |

नवरात्र के नौ दिनों में मां के अलग-अलग स्वरूप की पूजा की जाती है | पहला दिन माता शैलपुत्री को समर्पित होता है | इसके बाद क्रमशः ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री की आराधना होती है | नवरात्रि का पहला दिन देवी शैलपुत्री की उपासना का दिन है | देवी, पर्वतों के राजा शैल की सुपुत्री थीं इसलिए इनको शैलपुत्री नाम दिया गया | माता प्रकृति की देवी हैं इसलिए नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है | मां शैलपुत्री को देवी पार्वती का अवतार माना जाता हैं | पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा | नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है |

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री का विधिवत पूजन किया जाता है | इसी दिन से हिन्दू नववर्ष यानी नए संवत्सर की शुरुआत होती है | पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण मां दुर्गा जी का नाम शैलपुत्री पड़ा. मां शैलपुत्री नंदी नाम के वृषभ पर सवार पर सवार होती हैं और उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प होता है | मां शैलपुत्री के पूजन से जीवन में स्थिरता और दृढ़ता आती है | खासतौर पर महिलाओं को मां शैलपुत्री के पूजन से विशेष लाभ होता है | महिलाओं की पारिवारिक स्थिति, दांपत्य जीवन, कष्ट क्लेश और बीमारियां मां शैलपुत्री की कृपा से दूर होते हैं |

शारदीय नवरात्रि का पहला दिन – पहले नवरात्र की व्रत कथा

एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया | इसमें उन्होंने सारे  देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकर जी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया | सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा |

अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई | सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं | अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है | उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है | कोई सूचना तक नहीं भेजी है | ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा |’

शंकर जी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ | पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी | उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी |

सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है | सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं | केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया | बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे |

परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा | उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है | दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे | यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा | उन्होंने सोचा भगवान शंकर जी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है |

वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं | उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया | वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रुद्ध हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया |

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया | इस बार वे ‘शैलपुत्री’ नाम से विख्यात हुर्ईं | पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं | उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था |

शारदीय नवरात्रि का पहला दिन

देवी वाहन बैल है:-

मां शैलपुत्री के दाएं हाथ में डमरू और बाएं हाथ में त्रिशूल है | देवी का वाहन बैल है | मां शैलपुत्री के मस्तक पर अर्ध चंद्र विराजित है | माता शैलपुत्री मूलाधार चक्र की देवी मानी जाती हैं | माता शैलपुत्री योग की शक्ति द्वारा जागृत कर मां से शक्ति पाई जा सकती है | दुर्गा के पहले स्वरूप में शैलपुत्री मानव के मन पर नियंत्रण रखती हैं | चंद्रमा पर नियंत्रण रखने वाली शैलपुत्री उस नवजात शिशु की अवस्था को संबोधित करतीं हैं जो निश्चल और निर्मल है और संसार की सभी मोह-माया से परे है |

पूजा विधि:-

सबसे पहले मां शैलपुत्री की तस्वीर स्थापित करें और उसके नीचे लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं | इसके ऊपर केशर से ‘शं’ लिखें और उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें | तत्पश्चात् हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें |

मंत्र इस प्रकार है-

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:।

मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें | इसके बाद प्रसाद अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें | इस मंत्र का जप कम से कम 108 करें |

मंत्र – ॐ शं शैलपुत्री देव्यै: नम:।

मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद मां दुर्गा के चरणों में अपनी मनोकामना व्यक्त करके मां से प्रार्थना करें तथा आरती एवं कीर्तन करें | मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें | इसके बाद भोग अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें | यह जप कम से कम 108 होना चाहिए |

ABHA Card: ABHA (आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट) कैसे बनवाये? जाने यहाँ पर…

ABHA Card: केंद्र सरकार ने आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत डिजिटल हेल्थ कार्ड 2022, यानी ABHA (आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट ) की शुरुआत की है। National Health Authority (NHA) ने ट्विटर पर इसको लेकर कई ट्वीट भी किए।

डिजिटल हेल्थ कार्ड यानी ABHA Card :

यह एक तरह का ID कार्ड है, जो आपका डिजिटल पहचान पत्र भी है। इसमें आपके मेडिकल रिकॉर्ड सेव रहेंगे। यानी एक ही जगह पर आपकी पूरी मेडिकल हिस्ट्री डिजिटली इसमें सेव हो जाएगी।

अक्सर लोगों के पुराने मेडिकल रिपोर्ट्स या ट्रीटमेंट से रिलेटेड डॉक्युमेंट्स गुम जाते हैं या घर से निकलते वक्त वो इसे ले जाना भूल जाते हैं। ऐसे में उनकी पूरी रिपोर्ट और मेडिकल हिस्ट्री डिजिटल तरीके से सेव रहेगी, जो जरूरत के वक्त उनके काम आएगी।

डिजिटल हेल्थ कार्ड यानी ABHA Card बनवाने के फायदे :

डिजिटल हेल्थ कार्ड यानी ABHA Card बनवाने के आवश्यक दस्तावेज :

  • आधार कार्ड
  • बैंक पासबुक
  • राशन कार्ड
  • स्थाई निवास प्रमाण पत्र
  • मोबाइल नंबर
  • पासपोर्ट साइज फोटो

ABHA Card कैसे बना सकते हैं?

इसके लिए नीचे दिए गए स्टेप्स को फॉलो करें

स्टेप1: सबसे पहले आयुष्मान डिजिटल हेल्थ मिशन (Ayushman Digital Health Mission की वेबसाइट पर जाएं।

स्टेप2. अब होम पेज पर Create Your ABHA Number के ऑप्शन पर क्लिक करें।

स्टेप3. ABHA Number जनरेट करने के लिए दो ऑप्शन दिखाई देंगे, जिसमें कंफर्टेबल हैं, उसे चुनें।

स्टेप4. आधार नंबर या ड्राइविंग लाइसेंस पर क्लिक करें और अगले पेज पर उसका नंबर डालकर सबमिट करें।

स्टेप5. रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर एक OTP आएगा। इसे डालकर आप ABHA Card का एप्लिकेशन भरें।

स्टेप6. एप्लिकेशन में पूछी गई जानकारी देने के बाद उसे सबमिट कर दें। इसके बाद अपनी फोटो अपलोड करें।

स्टेप 7. इसके लिए My Account पर क्लिक करें। दिए गए ऑप्शन में से Edit Profile पर क्लिक करें और फोटो अपलोड करें।

स्टेप8. अब सबमिट पर क्लिक कर दें। आपका ABHA Card बन जाएगा।

स्टेप9. इसे डाउनलोड करें और प्रिंट आउट निकाल लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न :

1. ABHA Card बनवाने के लिए कौन अप्लाई कर सकता है?

जो लोग अपना मेडिकल रिकॉर्ड इलेक्ट्रॉनिक तरीके से सुरक्षित रखना चाहते हैं, वो सभी लोग इसके लिए अप्लाई कर सकते हैं।

2. ये कार्ड सिर्फ सरकारी अस्पताल में काम आएगा या प्राइवेट में भी?

ये कार्ड सरकारी और प्राइवेट दोनों अस्पताल में काम आएगा। इतना ही नहीं इसका इस्तेमाल किसी भी डॉक्टर के निजी क्लीनिक में भी किया जा सकेगा।

3. डॉक्टर्स या हेल्थ प्रोफेशनल बिना पेशेंट की सहमति के उसका मेडिकल डेटा देख सकते हैं?

नहीं, आपका मेडिकल डेटा देखने के लिए उन्हें आपकी सहमति की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए उन्हें ABHA Card या फिर OTP की जरूरत होगी, जिसे व्यक्ति की सहमति पर ही देखा जा सकेगा। ताकि पेशेंट की प्राइवेसी बनी रहे।

4. ABHA Card से आपकी मेडिकल हिस्ट्री कैसे रीड की जा सकती है?

ABHA Card बनाने पर आपको 14 अंकों का ID नंबर मिलेगा। साथ ही इसमें एक QR कोड होगा। इसे स्कैन करके आपकी मेडिकल जानकारी रीड की जा सकती है।

5. इस कार्ड से रिलेटेड कोई ऐप है या नहीं?

बिल्कुल है। आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट यानी ABHA ऐप प्ले स्टोर पर मौजूद है, जिसे पहले NDHM हेल्थ रिकॉर्ड्स ऐप के नाम से जाता था।

6. बहुत लोगों के मन में ये सवाल होगा कि ABHA Card यानी आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट और आयुष्मान कार्ड एक ही है या अलग-अलग? आखिर इन दोनों में क्या अंतर है?

आयुष्मान कार्ड
1.यह एक हेल्थ इंश्योरेंस कार्ड है।
2.आयुष्मान कार्ड सिर्फ गरीब लोगों के लिए है।
3.यह इलाज के वक्त फाइनेंशियली मदद करता है।
4.इस कार्ड में शहरी और ग्रामीण लोगों के लिए अलग-अलग क्राइटेरिया है।
ABHA Card
1.यह एक डिजिटल हेल्थ अकाउंट कार्ड है।
2.कोई भी भारतीय नागरिक इसे बना या बनवा सकता है।
3.मेडिकल या हेल्थ डेटा देखने और शेयर करने के काम आता है।
4.इस कार्ड के लिए कोई क्राइटेरिया तय नहीं है।

समग्र पोर्टल : समग्र आई डी में ऑनलाइन नाम कैसे सुधारे?

Samagra ID में नाम सुधार कैसे करें: मध्य प्रदेश राज्य सरकार की किसी भी सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए परिवार के सभी सदस्यों को समग्र पोर्टल में पंजीकृत होना जरुरी होता है । या कह सकते हैं समग्र आईडी के माध्यम से ही आप सरकारी अनुदान प्राप्त कर सकते हैं ।

यदि आप मध्य प्रदेश के निवासी है तो समग्र आईडी से परिचित ही होंगे हमने पहले भी समग्र आईडी के बारे में अपने लेखों के माध्यम से आपको अवगत कराया है जैसे की अपने या परिवार की समग्र आईडी निकलना, समग्र आईडी ढूंढना, आधार, मोबाइल नंबर और नाम के माध्यम से समग्र आईडी पता करना आदि जिसकी जानकारी के लिए आप यहाँ क्लिक करें ।

हमने अधिकतर समग्र आई डी में पाया है कि समग्र आईडी में नाम, लिंग, उम्र, पिता, माता का नाम जैसी कई गलतियां हैं, कुछ गलतियां ऑपरेटर द्वारा की जाती हैं। कोई भी समग्र आईडी ऐसी नहीं होगी जिसमें गलतियाँ न हों और कभी-कभी हम उनकी गलतियों के कारण बहुत परेशानी का सामना कर सकते हैं।

आपको यह जानकर ख़ुशी होगी की अब ऑनलाइन ही नाम, जन्मतिथि, और लिंग में परिवर्तन किया जा सकता है जिसमे लगभग २ से ३ कार्य दिवसों में सुधार की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है ऑनलाइन नाम, जन्मतिथि, और लिंग में परिवर्तन करना बहुत ही आसान है जिसके बारे में हम यहाँ आपको बताने जा रहे हैं

आवश्यक दिशा निर्देश : समग्र आईडी में ऑनलाइन नाम सुधार हेतु:

  1. You would need an active Mobile No to register a request (अनुरोध पंजीकृत करने के लिए आपको एक सक्रिय मोबाइल नंबर की आवश्यकता होगी)
  2. When you submit the Request for Change please exercise due caution and diligence. (जब आप परिवर्तन के लिए अनुरोध करते हैं तो कृपया सावधानी बरतें और ध्यान से करें।)
  3. After your request is submitted you would receive an 6 digit PIN on the mobile No. This OTP is required to verify your identity. (आपका अनुरोध जमा होने के बाद आपको मोबाइल नंबर पर 6 अंकों का पिन प्राप्त होगा। इस ओटीपी के माध्यम से पहचान सत्यापित करने की आवश्यकता है।)

आवश्यक दस्तावेज

इन दस्तावेज़ों में से एक संलग्न करें | (Document size should be less than 100KB.)

  • कक्षा १०वी की मार्कशीट
  • आधार कार्ड
  • मतदाता पहचान पत्र
  • राशन कार्ड
  • पैनकार्ड
  • पासपोर्ट
  • ड्राइविंग लाइसेंस
  • Official introduction letter (शासकीय परिचय पत्र)
  • Identity card issued by public sector unit (सावजनिक क्षेत्र की ईकाई द्वारा जारी परिचय पत्र)
  • Certificate of disability issued by the Medical Board (मेडिकल बोर्ड द्वारा जारी निःशक्तता का प्रमाण पत्र)

समग्र आईडी में नाम सुधार कैसे करे :

समग्र आई डी  में नाम सुधार के लिए नीचे दिए गए चरणों का पालन करना पड़ेगा |

स्टेप 1: समग्र आईडी में सुधार करने के लिए सबसे पहले आप समग्र पोर्टल की वेबसाइट http://samagra.gov.in/ पर जाएं।

स्टेप 2: अब समग्र नागरिक सेवा अनुभाग में जाकर ‘नाम अपडेट करें‘ लिंक पर क्लिक करें।

स्टेप3: जिस सदस्य का नाम समग्र आईडी में सही किया जाना है, उसकी 9 अंकों की समग्र आईडी दर्ज करें।

स्टेप 4: अब सदस्य विवरण प्राप्त करें बटन पर क्लिक करें।

स्टेप 5:सदस्य विवरण प्राप्त करें बटन पर क्लिक करते ही दर्ज किए गए समग्र आईडी नंबर के अनुसार, विवरण आपकी स्क्रीन पर आ जाएगा।

स्टेप 6: नाम सुधार की प्रक्रिया के लिए, आपको अपने दस्तावेज़ों के अनुसार सही नाम दर्ज करना होगा।

स्टेप 7: संबंधित निर्देशों के अनुसार दस्तावेजों का प्रमाण भी अपलोड करना होगा।

स्टेप 8: अपलोड करने के बाद मोबाइल नंबर पर OTP प्राप्त होगा।

स्टेप 9: सत्यापन के बाद आपका अनुरोध भेजा जाएगा।

आपके अनुरोध को स्वीकार करने के बाद, दस्तावेजों के सत्यापन के बाद नाम सुधार की प्रक्रिया आमतौर पर अधिकारियों द्वारा दो से तीन कार्य दिवसों में पूरी की जाती है, जिसके बाद आप पूरी आईडी को चेक कर और प्रिंट ले सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

1. समग्र आईडी में सुधार कैसे करें?

आपको समग्र आईडी में सुधार करने के लिए आवश्यक दस्तावेजों की स्कैन कॉपी के साथ आपको नीचे दिए गए लिंक पर जाना होगा।
http://samagra.gov.in/Citizen/RFC/NameChangeRequest.aspx आपको वहां अपनी समग्र आईडी दर्ज करके अपना अनुरोध ऑनलाइन करना होगा।

समग्र आईडी में नाम अपडेट करने की प्रक्रिया क्या है?

आप घर बैठे समग्र में अपना नाम अपडेट या सही कर सकते हैं, इसके लिए आप http://samagra.gov.in/Citizen/RFC/NameChangeRequest.aspx आपको वहां अपनी समग्र आईडी दर्ज करके अपना अनुरोध ऑनलाइन करना होगा।

Sharda Mata Maihar – माँ शारदा माता, मैहर के बारे में जाने सब कुछ

माँ शारदा माता- मंदिर की खोज के बाद आल्हा ने इस मंदिर में 12 साल तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया. भक्त की तपस्या से खुश होकर मां ने आल्हा को अमरता का वरदान दे दिया. मां शारदा के मंदिर प्रांगण में फूलमती माता का मंदिर आल्हा की कुल देवी का है. आस्था है कि हर दिन ब्रह्म मुहुर्त में खुद आल्हा द्वारा मां की पूजा-अर्चना की जाती है. 

मां के मंदिर की तलहटी में आज भी आल्हा देव के अवशेष हैं, उनकी तलवार और खड़ाऊ आम भक्तों के दर्शन के लिए रखी गई है. यहां आल्हा तालाब भी है, जिसे प्रशासन ने संरक्षित कर रखा है. सूचना बोर्ड में इस तालाब के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व का वर्णन किया गया है, यहां आल्हा-उदल अखाड़ा भी है. 

देशभर में शारदीय नवरात्र की शुरुआत हो चुकी है . मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक मध्य प्रदेश के सतना जिले में भी स्थित है मैहर , मैहर में पहाड़ों पर बसे इस शक्तिपीठ में हर नवरात्रि के अवसर पर मेला लगता है, इस दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं. हर सुबह 4 बजे माता की आरती होती है इसमें लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं .आज हम आप को माँ शारदा माता मैहर (मैहर शक्तिपीठ) के इतिहास से जुडी जानकरी दे रहे हैं , अतः आप सभी से अनुरोध है कि आर्टिकल को पूरा पढ़े |

मैहर :

मैहर  मध्य प्रदेश की एक तहसील है । यह एक प्रसिद्ध  हिन्दू तीर्थ स्थल है। यह सतना जिले में है| मैहर में शारदा माँ का प्रसिद्ध मन्दिर है जो नैसर्गिक रूप से समृद्ध कैमूर तथा विंध्य की पर्वत श्रेणियों की गोद में अठखेलियां करती तमसा के तट पर त्रिकूट पर्वत की पर्वत मालाओं के मध्य 600 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यह ऐतिहासिक मंदिर 108 शक्ति पीठो में से एक है। यह पीठ सतयुग के प्रमुख अवतार नृसिंह भगवान के नाम पर ‘नरसिंह पीठ’ के नाम से भी विख्यात है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर  आल्हखंड के नायक  आल्हा  व  दोनों भाई मां शारदा के अनन्य उपासक थे। पर्वत की तलहटी में आल्हा का तालाब व अखाड़ा आज भी विद्यमान है।

यहाँ प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी आते हैं किंतु वर्ष में दोनों नवरात्रो में यहां मेला लगता है जिसमें लाखों दर्शनार्थी मैहर आते हैं। मां शारदा के बगल में प्रतिष्ठापित नरसिंहदेव जी की पाषाण मूर्ति आज से लगभग 1500 वर्ष पूर्व की है। देवी शारदा का यह प्रसिद्ध शक्तिपीठ स्थल देश के लाखों भक्तों के आस्था का केंद्र है माता का यह मंदिर धार्मिक तथा ऐतिहासिक है। वर्तमान में यहां पर आर्थिक दृष्टि से सीमेंट की तीन फैक्ट्रियां कार्यरत हैं। के जे एस के पास इच्छापूर्ति मंदिर पर्यटकों का दर्शनीय स्थल है ।

मैहर में लगता है हर साल मेला :

मैहर में मां शारदा का मंदिर है, यहां हर साल शारदीय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि में मेला लगता है. देश-विदेश से मां के भक्त अपनी इच्छाएं लेकर मंदिर पहुंचते हैं. मां शारदा उन देवियों में से हैं, जिन्होंने कलयुग में भी अपने भक्त आल्हा की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे अमरता का वरदान दिया था. माना जाता है कि नवरात्रि में आज भी देवी मां की पहली पूजा आल्हा देव ही करते हैं |

विंध्य की पर्वत श्रेणियों में बसा है माँ शारदा का मंदिर : माँ शारदा माता

आदि शक्ति मां शारदा देवी का मंदिर मैहर नगर के पास विंध्य पर्वत श्रेणियों के बीच त्रिकूट पर्वत पर स्थित है. मां भवानी के 51 शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर में मान्यता है कि यहां मां शारदा की पहली पूजा आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी. मैहर स्थित पर्वत का नाम प्राचीन धर्म ग्रंथों में भी मिलता है, इसका उल्लेख भारत के अन्य पर्वतों के साथ ही पुराणों में भी कई बार आया है. माता के इस मंदिर तक जाने के लिए भक्तों को 1063 सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ता है, हर दिन यहां हजारों श्रद्धालु आते हैं|

इस कारण बना मैहर शक्तिपीठ :

माँ शारदा माता, मैहर

माँ शारदा के लाइव दर्शन करने के लिए यहाँ क्लिक करे|

माता के इस मंदिर तक जाने के लिए भक्तों को 1063 सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ता है, हर दिन यहां हजारों श्रद्धालु आते हैं. मंदिर के बारे माना जाता है कि दक्ष प्रजापति की पुत्री सती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थी. लेकिन राजा दक्ष को यह इच्छा मंजूर नहीं थी, बावजूद इसके माता सती ने जिद कर भगवान शिव से विवाह कर लिया |

माता सती ने किया था देह त्याग

माता सती और भगवान शिव के विवाह के बाद राजा दक्ष ने एक यज्ञ करवाया, जिसमें उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया. भगवान शिव को नहीं बुलाया गया, यज्ञ स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित ना करने का कारण पूछा, इस पर राजा दक्ष ने भगवान शंकर को अपशब्द कह दिए. इस अपमान से दुखी होकर माता सती ने यज्ञ अग्नि कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए|

‘माई का हार’ बन गया ‘मैहर’

सती के देह त्याग के बारे में भगवान शिव को पता चलते ही क्रोध में आकर उनका तीसरा नेत्र खुल गया, माना जाता है कि ब्रह्मांड की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया. जहां भी सती के अंग गिरे वहां शक्तिपीठों का निर्माण हुआ, माना जाता है कि सतना के पास माता सती का हार गिरा था, जिस कारण जगह का नाम ‘माई का हार’ पड़ गया लेकिन अपभ्रंश होकर इसका नाम मैहर हो गया, इसी कारण इसे भी शक्तिपीठ माना गया |

आल्हाखंड ने ढूंढ निकाला मंदिर :

त्रिकूट पर्वत की चोटी पर स्थित यह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र बन चुका है. देश-विदेश से पर्यटक यहां सिर्फ मां शारदा की एक झलक देखने के लिए पहुंचते हैं. मंदिर का ऐतिहासिक महत्व भी है, बताया जाता है कि आल्हाखंड के नायक दो सगे भाई आल्हा और उदल मां शारदा के अनन्य उपासक थे. आल्हा-उदल ने ही सबसे पहले जंगल के बीच मां शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी |

मां ने आल्हा को दे दिया अमरता का आशीर्वाद :

मंदिर की खोज के बाद आल्हा ने इस मंदिर में 12 वर्ष तक तपस्या कर माँ शारदा देवी को प्रसन्न किया, भक्त की तपस्या से खुश होकर मां ने आल्हा को अमरता का वरदान दे दिया. मां शारदा के मंदिर प्रांगण में फूलमती माता का मंदिर आल्हा की कुल देवी का है. आस्था है कि हर दिन ब्रह्म मुहुर्त में खुद आल्हा द्वारा मां की पूजा-अर्चना की जाती है. 

मां के मंदिर की तलहटी में आज भी आल्हा देव के अवशेष हैं, उनकी तलवार और खड़ाऊ आम भक्तों के दर्शन के लिए रखी गई है. यहां आल्हा तालाब भी है, जिसे प्रशासन ने संरक्षित कर रखा है. सूचना बोर्ड में इस तालाब के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व का वर्णन किया गया है, यहां आल्हा-उदल अखाड़ा भी है. 

कौन थे आल्हा?

आल्हा और ऊदल दो भाई थे. ये बुन्देलखण्ड के महोबा के वीर योद्धा और परमार के सामंत थे. कालिंजर के राजा परमार के दरबार में जगनिक नाम के एक कवि ने आल्हा खण्ड नामक एक काव्य रचा था. उसमें इन वीरों की गाथा वर्णित है. इस ग्रंथ में दों वीरों की 52 लड़ाइयों का रोमांचकारी वर्णन है. आखरी लड़ाई उन्होंने पृथ्‍वीराज चौहान के साथ लड़ी थी. मां शारदा माई के भक्त आल्हा आज भी मां की पूजा और आरती करते हैं. 

आल्हाखण्ड ग्रंथ :

आल्हाखण्ड में गाया जाता है कि इन दोनों भाइयों का युद्ध दिल्ली के तत्कालीन शासक पृथ्वीराज चौहान से हुआ था. पृथ्‍वीराज चौहान को युद्ध में हारना पड़ा था लेकिन इसके पश्चात आल्हा के मन में वैराग्य आ गया और उन्होंने संन्यास ले लिया था. कहते हैं कि इस युद्ध में उनका भाई वीरगति को प्राप्त हो गया था. गुरु गोरखनाथ के आदेश से आल्हा ने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया था. पृथ्वीराज चौहान के साथ उनकी यह आखरी लड़ाई थी. मान्यता है कि मां के परम भक्त आल्हा को मां शारदा का आशीर्वाद प्राप्त था, लिहाजा पृथ्वीराज चौहान की सेना को पीछे हटना पड़ा था. मां के आदेशानुसार आल्हा ने अपनी साग (हथियार) शारदा मंदिर पर चढ़ाकर नोक टेढ़ी कर दी थी. जिसे आज तक कोई सीधा नहीं कर पाया है. मंदिर परिसर में ही तमाम ऐतिहासिक महत्व के अवशेष अभी भी आल्हा व पृथ्वीराज चौहान की जंग की गवाही देते हैं.

मंदिर के रहस्यों को वैज्ञानिक भी नहीं सुलझा पाए :

मध्यप्रदेश के सतना जिले में मैहर तहसील के पास त्रिकूट पर्वत पर स्थित माता के इस मंदिर को मैहर देवी का शक्तिपीठ कहा जाता है. मैहर का मतलब है मां का हार. माना जाता है कि यहां मां सती का हार गिरा था| माँ शारदा के इस मंदिर की ऐसी मान्यता है कि शाम की आरती होने के बाद जब मंदिर के कपाट बंद करके सभी पुजारी नीचे आ जाते हैं, तब देर रात्रि यहां मंदिर के अंदर से घंटी और पूजा करने की आवाज आती है. लोग कहते है कि मां के भक्त ”आल्हा” अभी भी पूजा करने आते हैं. अक्सर सुबह की आरती वे ही करते हैं, और रोज जब मंदिर के पट खुलते है तब कुछ न कुछ रहस्यमय अजूबे के दर्शन होते है. कभी मन्दिर के गर्भगृह रोशनी से सरोबार रहता है तो कभी अद्भुत खुशबू से. अक्सर मन्दिर के गर्भगृह में मां शारदा के ऊपर अद्भुत फूल चढ़ा मिलता है. मैहर माता के मंदिर में लोग अपनी मनमांगी मुरादे पाने के लिए साल भर आते है. ऐसी मान्यता है कि शारदा माता इंसान को अमर होने का वर प्रदान करती है.

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माँ शारदा मंदिर का इतिहास :

विन्ध्य पर्वत श्रेणियों के मध्य त्रिकूट पर्वत पर स्थित इस मंदिर के बारे मान्यता है कि मां शारदा की प्रथम पूजा आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा की गई थी. मैहर पर्वत का नाम प्राचीन धर्मग्रंथ ”महेन्द्र” में मिलता है. इसका उल्लेख भारत के अन्य पर्वतों के साथ पुराणों में भी आया है. मां शारदा की प्रतिमा के ठीक नीचे के न पढ़े जा सके शिलालेख भी कई पहेलियों को समेटे हुए हैं. सन्‌ 1922 में जैन दर्शनार्थियों की प्रेरणा से तत्कालीन महाराजा ब्रजनाथ सिंह जूदेव ने शारदा मंदिर परिसर में जीव बलि को प्रतिबंधित कर दिया था.

पिरामिडाकार त्रिकूट पर्वत में विराजीं मां शारदा का यह मंदिर 522 ईसा पूर्व का है. कहते हैं कि 522 ईसा पूर्व चतुर्दशी के दिन नृपल देव ने यहां सामवेदी की स्थापना की थी, तभी से त्रिकूट पर्वत में पूजा-अर्चना का दौर शुरू हुआ. ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस तथ्य का प्रमाण प्राप्त होता है कि सन्‌ 539 (522 ईपू) चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नृपलदेव ने सामवेदी देवी की स्थापना की थी|

कैसे पहुंचे माँ शारदा माता, मैहर :

वायु मार्ग:

मैहर तक पहुंचने के लिए निकटतम हवाई अड्डा, जबलपुर, खजुराहो और इलाहाबाद है। इन हवाई अड्डों से आप ट्रेन, बस या टैक्सी से आसानी से मैहर तक पहुंच सकते हैं। जबलपुर से मैहर दूरी 150 किलोमीटर खजुराहो से मैहर दूरी 130 किलोमीटर इलाहाबाद से मैहर दूरी 200 किलोमीटर |

ट्रेन द्वारा

आम तौर पर सभी ट्रेनों में मैहर स्टेशन पर रोक नहीं होती है, लेकिन नवरात्र उत्सवों के दौरान ज्यादातर ट्रेनें मैहर पर रुकती हैं। सभी ट्रेनों के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन जंक्शन – सतना स्टेशन से मैहर स्टेशन की दूरी 36 किलोमीटर है मैहर स्टेशन से कटनी स्टेशन की दूरी 55 किलोमीटर है|

सड़क मार्ग

मैहर शहर अच्छी तरह से राष्ट्रीय राजमार्ग 7 के साथ सड़क से जुड़ा हुआ है . आप आसानी से निकटतम प्रमुख शहरों से मैहर शहर के लिये नियमित बसें पा सकते हैं।

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Shardiya Navratri 2022 का पहला दिन : मां शैलपुत्री की कैसे करें पूजा

Shardiya Navratri 2022:-

नवरात्र के नौ दिनों में मां के अलग-अलग स्वरूप की पूजा की जाती है | पहला दिन माता शैलपुत्री को समर्पित होता है | इसके बाद क्रमशः ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री की आराधना होती है | नवरात्रि का पहला दिन देवी शैलपुत्री की उपासना का दिन है | देवी, पर्वतों के राजा शैल की सुपुत्री थीं इसलिए इनको शैलपुत्री नाम दिया गया | माता प्रकृति की देवी हैं इसलिए नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है | मां शैलपुत्री को देवी पार्वती का अवतार माना जाता हैं | पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा | नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है |

देवी मां के पावन दिन का पर्व शारदीय नवरात्रि आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को 26 सितम्बर 2022 से आरंभ होगा |अक्टूबर तक चलने वाले इन दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है | अक्टूबर को धूमधाम के साथ विजयदशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा | इसी दिन दुर्गा विसर्जन भी किया जाएगा | शास्त्रों में मां दुर्गा के नौ रूपों का बखान किया गया है | नवरात्र के दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने से विशेष पुण्य मिलता है | मान्यता है कि मां दुर्गा अपने भक्तों के हर कष्ट हर लेती हैं |

माँ शैलपुत्री – पहले नवरात्र की व्रत कथा:-

एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया | इसमें उन्होंने सारे  देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकर जी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया | सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा |

अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई | सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं | अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है | उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है | कोई सूचना तक नहीं भेजी है | ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा |’

शंकर जी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ | पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी | उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी |

सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है | सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं | केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया | बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे |

परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा | उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है | दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे | यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा | उन्होंने सोचा भगवान शंकर जी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है |

वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं | उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया | वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रुद्ध हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया |

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया | इस बार वे ‘शैलपुत्री’ नाम से विख्यात हुर्ईं | पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं | उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था |

देवी वाहन बैल है:-

मां शैलपुत्री के दाएं हाथ में डमरू और बाएं हाथ में त्रिशूल है | देवी का वाहन बैल है | मां शैलपुत्री के मस्तक पर अर्ध चंद्र विराजित है | माता शैलपुत्री मूलाधार चक्र की देवी मानी जाती हैं | माता शैलपुत्री योग की शक्ति द्वारा जागृत कर मां से शक्ति पाई जा सकती है | दुर्गा के पहले स्वरूप में शैलपुत्री मानव के मन पर नियंत्रण रखती हैं | चंद्रमा पर नियंत्रण रखने वाली शैलपुत्री उस नवजात शिशु की अवस्था को संबोधित करतीं हैं जो निश्चल और निर्मल है और संसार की सभी मोह-माया से परे है |

पूजा विधि:-

सबसे पहले मां शैलपुत्री की तस्वीर स्थापित करें और उसके नीचे लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं | इसके ऊपर केशर से ‘शं’ लिखें और उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें | तत्पश्चात् हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें |

मंत्र इस प्रकार है-

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:।

मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें | इसके बाद प्रसाद अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें | इस मंत्र का जप कम से कम 108 करें |

मंत्र – ॐ शं शैलपुत्री देव्यै: नम:।

मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद मां दुर्गा के चरणों में अपनी मनोकामना व्यक्त करके मां से प्रार्थना करें तथा आरती एवं कीर्तन करें | मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें | इसके बाद भोग अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें | यह जप कम से कम 108 होना चाहिए |

Shardiya Navratri 2022 का तीसरा दिन : मां चंद्रघंटा की कैसे करें पूजा

मां चंद्रघंटा:-

नवरात्रि के तीसरे दिन दुर्गा मां के चंद्रघंटा रूप की पूजा की जाती है | नौ दिनों तक चलने वाली नवरात्रि के दौरान मां के नौ रूपों की पूजा की जाती है | मां चंद्रघंटा राक्षसों का वध करने के लिए जानी जाती हैं | मान्यता है कि वह अपने भक्तों के दुखों को दूर करती हैं इसलिए उनके हाथों में धनुष, त्रिशूल, तलवार और गदा होता है | चंद्रघंटा माता का शिवदूती स्वरूप है | इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है | इनका रंग सोने के समान चमकीला है | इनकी मुद्रा युद्ध के लिए तैयार रहने जैसी है | इनके घंटे की भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव, दैत्य आदि सभी डरते हैं | असुरों के साथ युद्ध में देवी चंद्रघंटा ने घंटे की टंकार से असुरों का नाश कर दिया था |

देवी मां के पावन दिन का पर्व शारदीय नवरात्रि आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को 26 सितम्बर 2022 से आरंभ होगा |अक्टूबर तक चलने वाले इन दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है | अक्टूबर को धूमधाम के साथ विजयदशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा | इसी दिन दुर्गा विसर्जन भी किया जाएगा | शास्त्रों में मां दुर्गा के नौ रूपों का बखान किया गया है | नवरात्र के दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने से विशेष पुण्य मिलता है | मान्यता है कि मां दुर्गा अपने भक्तों के हर कष्ट हर लेती हैं |

चंद्रघंटा माता का स्वरूप देवी पार्वती के सुहागन रूप को दर्शाता है | भगवान शिव से विवाह के बाद पार्वती देवी ने अपने माथे पर आधा चंद्रमा धारण करना शुरू कर दिया जिसके कारण उनके इस रूप को चंद्रघंटा के नाम से जाना जाने लगा | माता चंद्रघंटा ने अपने माथे पर घंटे के आकार का आधा चंद्रमा धारण किया हुआ है, चंद्रघंटा माता की 10 भुजाएं हैं, जिनमें से 8 भुजाओं में कमल, कमंडल और विभिन्न अस्त्र-शस्त्र हैं |

चंद्रघंटा माता की कथा:-

देवताओं और असुरों के बीच लंबे समय तक युद्ध चला | असुरों का स्‍वामी महिषासुर था और देवाताओं के इंद्र | महिषासुर ने देवाताओं पर विजय प्राप्‍त कर इंद्र का सिंहासन हासिल कर लिया और स्‍वर्गलोक पर राज करने लगा | इसे देखकर सभी देवतागण परेशान हो गए और इस समस्‍या से निकलने का उपाय जानने के लिए त्र‍िदेव ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश के पास गए | देवताओं ने बताया कि महिषासुर ने इंद्र, चंद्र, सूर्य, वायु और अन्‍य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और उन्‍हें बंधक बनाकर स्‍वयं स्‍वर्गलोक का राजा बन गया है |

देवाताओं ने बताया कि महिषासुर के अत्‍याचार के कारण अब देवता पृथ्‍वी पर विचरण कर रहे हैं और स्‍वर्ग में उनके लिए स्‍थान नहीं है | यह सुनकर ब्रह्मा, विष्‍णु और भगवान शंकर को अत्‍यधिक क्रोध आया | क्रोध के कारण तीनों के मुख से ऊर्जा उत्‍पन्‍न हुई | देवगणों के शरीर से निकली ऊर्जा भी उस ऊर्जा से जाकर मिल गई | यह दसों दिशाओं में व्‍याप्‍त होने लगी |

तभी वहां एक देवी का अवतरण हुआ | भगवान शंकर ने देवी को त्र‍िशूल और भगवान विष्‍णु ने चक्र प्रदान किया | इसी प्रकार अन्‍य देवी देवताओं ने भी माता के हाथों में अस्‍त्र शस्‍त्र सजा दिए | इंद्र ने भी अपना वज्र और ऐरावत हाथी से उतरकर एक घंटा दिया | सूर्य ने अपना तेज और तलवार दिया और सवारी के लिए शेर दिया | देवी अब महिषासुर से युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार थीं | उनका विशालकाय रूप देखकर महिषासुर यह समझ गया कि अब उसका काल आ गया है | महिषासुर ने अपनी सेना को देवी पर हमला करने को कहा | अन्‍य दैत्य और दानवों के दल भी युद्ध में कूद पड़े |

देवी ने एक ही झटके में ही दानवों का संहार कर दिया | इस युद्ध में महिषासुर तो मारा ही गया, साथ में अन्‍य बड़े दानवों और राक्षसों का संहार मां ने कर दिया | इस तरह मां ने सभी देवताओं को असुरों से अभयदान दिलाया |

पूजा विधि:-

नवरात्रि के तीसरे दिन माता दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की​ विधि विधान से इस मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।

ऊँ चं चं चं चंद्रघंटायेः ह्रीं नम:।

का जाप कर आराधना करनी चाहिए | इसके बाद मां चंद्रघंटा को सिंदूर, अक्षत्, गंध, धूप, पुष्प आदि अर्पित करें | आप देवी मां को चमेली का पुष्प अथवा कोई भी लाल फूल अर्पित कर सकते हैं | साथ ही साथ, दूध से बनी किसी मिठाई का भोग लगाएं | पूजा के दौरान दुर्गा चालीसा का पाठ और दुर्गा आरती का गान करें |

Shardiya Navratri 2022 का चौथा दिन : मां कूष्‍मांडा की कैसे करें पूजा

मां कूष्‍मांडा:- Shardiya Navratri 2022 का चौथा दिन

Shardiya Navratri 2022 का चौथा दिन- नवरात्रि के चौथे दिन शक्ति की देवी मां दुर्गा के चौथे स्‍वरूप माता कूष्‍मांडा की पूजा की जाती है | हिन्‍दू मान्‍यताओं के अनुसार जब इस संसार में सिर्फ अंधकार था तब देवी कूष्‍मांडा ने अपने ईश्‍वरीय हास्‍य से ब्रह्मांड की रचना की थी | यही वजह है क‍ि देवी को सृष्टि के रचनाकार के रूप में भी जाना जाता है |

देवी मां के पावन दिन का पर्व शारदीय नवरात्रि आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को 26 सितम्बर 2022 से आरंभ होगा |अक्टूबर तक चलने वाले इन दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है | अक्टूबर को धूमधाम के साथ विजयदशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा | इसी दिन दुर्गा विसर्जन भी किया जाएगा | शास्त्रों में मां दुर्गा के नौ रूपों का बखान किया गया है | नवरात्र के दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने से विशेष पुण्य मिलता है | मान्यता है कि मां दुर्गा अपने भक्तों के हर कष्ट हर लेती हैं |

इसी के चलते इन्‍हें ‘आदिस्‍वरूपा’ या ‘आदिशक्ति’ कहा जाता है | नवरात्र के चौथे दिन मां कूष्‍मांडा के पूजन का विशेष महत्‍व है | पारंपरिक मान्‍यताओं के अनुसार जो भी भक्‍त सच्‍चे मन से नवरात्र के चौथे दिन मां कूष्‍मांडा की पूजा करता है उसे आयु, यश और बल की प्राप्‍ति होती है |

मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं हैं, उनकी पूजा करने से व्यक्ति के समस्त कष्टों, दुखों और विपदाओं का नाश होता है | मां कूष्मांडा को गुड़हल का फूल या लाल फूल बहुत प्रिय है, इसलिए उनकी पूजा में गुड़हल का फूल अर्पित करें | इससे मां कूष्मांडा जल्द प्रसन्न होती हैं | मां दुर्गा ने असुरों का संहार करने के लिए कूष्मांडा स्वरूप धारण किया था |

कौन हैं मां कूष्‍मांडा:-

‘कु’ का अर्थ है ‘कुछ’, ‘ऊष्‍मा’ का अर्थ है ‘ताप’ और ‘अंडा’ का अर्थ है ‘ब्रह्मांड’ | शास्‍त्रों के अुनसार मां कूष्‍मांडा ने अपनी दिव्‍य मुस्‍कान से संसार में फैले अंधकार को दूर किया था | चेहरे पर हल्की मुस्कान लिए माता कूष्‍मांडा को सभी दुखों को हरने वाली मां कहा जाता है |

इनका निवास स्थान सूर्य है | यही वजह है माता कूष्‍मांडा के पीछे सूर्य का तेज दर्शाया जाता है | मां दुर्गा का यह इकलौता ऐसा रूप है जिन्हें सूर्यलोक में रहने की शक्ति प्राप्त है | देवी को कुम्‍हड़े की बलि प्रिय है | 

Shardiya Navratri 2020 का चौथा दिन

मां कूष्‍मांडा का रूप:-

चेहरे पर हल्‍की मुस्‍कान लिए मां कूष्‍मांडा की आठ भुजाएं हैं | इसलिए इन्‍हें अष्‍टभुजा भी कहा जाता है | इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, कलश, चक्र और गदा है | आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है | देवी के हाथ में जो अमृत कलश है उससे वह अपने भक्‍तों को दीर्घायु और उत्तम स्‍वास्‍थ्‍य का वरदान देती हैं | मां कूष्‍मांडा सिंह की सवारी करती हैं जो धर्म का प्रतीक है |

मां कूष्‍मांडा की पूजा विधि :-

  • नवरात्रि के चौथे दिन सुबह-सवेरे उठकर स्‍नान कर हरे रंग के वस्‍त्र धारण करें |
  • मां की फोटो या मूर्ति के सामने घी का दीपक जलाएं और उन्‍हें तिलक लगाएं |
  • अब देवी को हरी इलायची, सौंफ और कुम्‍हड़े का भोग लगाएं |
  • अब ‘ऊं कूष्‍मांडा देव्‍यै नम:’ मंत्र का 108 बार जाप करें |
  • मां कूष्‍मांडा की आरती उतारें और क‍िसी ब्राह्मण को भोजन कराएं या दान दें |
  • इसके बाद स्‍वयं भी प्रसाद ग्रहण करें |

Shardiya Navratri 2022 का पांचवा दिन : मां स्कंदमाता की कैसे करें पूजा

माँ स्कंदमाता:-

नवरात्रि के पांचवे दिन दुर्गा मां के स्कंदमाता रूप की पूजा की जाती है | शास्त्रों के अनुासर, इनकी कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी हो जाता है | पहाड़ों पर रहकर सांसारिक जीवों में नवचेतना का निर्माण करने वालीं देवी हैं स्कंदमाता |

हिंदी पंचाग के अनुसार साल में नवरात्रि 4 बार मनाई जाती है | दो बार गुप्त नवरात्रि और दो नवरात्रि को मुख्य रूप से मनाया जाता है | इसमें चैत्र और शारदीय मुख्य नवरात्रि हैं, जिसे देशभर में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है | नवरात्रि का मतलब है नौ रातें | नौ दिन तक चलने वाले शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है |

देवी मां के पावन दिन का पर्व शारदीय नवरात्रि आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को 26 सितम्बर 2022 से आरंभ होगा | अक्टूबर तक चलने वाले इन दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है | अक्टूबर को धूमधाम के साथ विजयदशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा | इसी दिन दुर्गा विसर्जन भी किया जाएगा | शास्त्रों में मां दुर्गा के नौ रूपों का बखान किया गया है | नवरात्र के दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने से विशेष पुण्य मिलता है | मान्यता है कि मां दुर्गा अपने भक्तों के हर कष्ट हर लेती हैं |

स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कंदमाता नाम से भी जाना जाता है | इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं | भक्त को मोक्ष मिलता है| वहीं, मान्‍यता ये भी है कि इनकी पूजा करने से संतान योग की प्राप्‍ति होती है |

स्कंदमाता की पूजा करने से शत्रुओं और विकट परिस्थितियों पर विजय प्राप्त होता है, वहीं, नि:संतान दंपत्तियों को संतान सुख मिलता है | जो मोक्ष की कामना करते हैं, उनको देवी मोक्ष प्रदान करती हैं | माता को पहली प्रसूता भी कहा जाता है | 

मां दुर्गा के पंचम स्वरूप को स्कंदमाता के रूप में पूजते हैं | माता स्कंदमाता शेर पर सवार रहती हैं |उनकी चार भुजाएं हैं | ये दाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद को गोद में पकड़े हुए हैं | नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प धारण किए हुए हैं | मां का ऐसा स्वरूप भक्तों के लिए कल्याण कारी है |

कहते हैं कि सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी की पूजा से तेज और कांति की प्राप्ति होती है | वात्सल्य की देवी मां कमल आसान पर विराजमान होकर अपनी चार भुजाओं में से एक में भगवान स्कन्द को गोद लिए हैं | दूसरी व चौथी भुजा में कमल का फूल, तीसरी भुजा से आशीर्वाद दे रही है | इनको इनके पुत्र के नाम से भी पुकारा जाता है |

कौन हैं माँ स्कंदमाता:-

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार देवी स्‍कंदमाता ही हिमालय की पुत्री हैं और इस वजह से इन्‍हें पार्वती कहा जाता है | महादेव की पत्‍नी होने के कारण इन्‍हें माहेश्‍वरी भी कहते हैं | इनका वर्ण गौर है इसलिए इन्‍हें देवी गौरी के नाम से भी जाना जाता है |

मां कमल के पुष्प पर विराजित अभय मुद्रा में होती हैं इसलिए इन्‍हें पद्मासना देवी और विद्यावाहिनी दुर्गा भी कहा जाता है | भगवान स्कंद यानी कार्तिकेय की माता होने के कारण इनका नाम स्‍कंदमाता पड़ा | स्‍कंदमाता प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं की सेनापति बनी थीं | इस वजह से पुराणों में कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है |

माँ स्कंदमाता

पूजा विधि:- माँ स्कंदमाता

नवरात्रि के पांचवे दिन स्नान आदि से निवृत हो जाएं और फिर स्कंदमाता का स्मरण करें | इसके पश्चात स्कंदमाता को अक्षत्, धूप, गंध, पुष्प अर्पित करें | उनको बताशा, पान, सुपारी, लौंग का जोड़ा, किसमिस, कमलगट्टा, कपूर, गूगल, इलायची आदि भी चढ़ाएं। फिर स्कंदमाता की आरती करें | स्कंदमाता की पूजा करने से भगवान कार्तिकेय भी प्रसन्न होते हैं |

स्कंदमाता की पूजा का श्रेष्ठ समय है दिन का दूसरा पहर | इनकी पूजा चंपा के फूलों से करनी चाहिए | इन्हें मूंग से बने मिष्ठान का भोग लगाएं | श्रृंगार में इन्हें हरे रंग की चूडियां चढ़ानी चाहिए | इनकी उपासना से मंदबुद्धि व्यक्ति को बुद्धि व चेतना प्राप्त होती है, पारिवारिक शांति मिलती है, इनकी कृपा से ही रोगियों को रोगों से मुक्ति मिलती है तथा समस्त व्याधियों का अंत होता है | देवी स्कंदमाता की साधना उन लोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ है जिनकी आजीविका का संबंध मैनेजमेंट, वाणिज्य, बैंकिंग अथवा व्यापार से है |

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Happy Navratri Wishes in Hindi 2022

Happy Navratri Wishes in Hindi– ग्राहकों से गुलजार दुकानें, बाजार रोशनी और सजे हुए पंडालों से सुसज्जित हैं, नवरात्रि एक शुभ नौ दिनों का उत्सव है जिसके दौरान देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। प्रत्येक दिन देवी के एक विशेष अवतार को समर्पित है। शैलपुत्री के साथ शुरू और सिद्धिदात्री के साथ समाप्त, इन नौ दिनों, देवी दुर्गा पृथ्वी पर माना जाता है।

पहले दिन, लोग देवी शैलपुत्री की पूजा करते हैं, जबकि दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। तीसरा दिन देवी चंद्रघंटा को समर्पित है जबकि चौथा दिन देवी कूष्मांडा के लिए है; पाँचवें दिन देवी स्कंदमाता की पूजा की जाती है और छठे दिन देवी कात्यायनी देवी की पूजा करते हैं। सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है और आठवें दिन देवी महागौरी के लिए होती है। अंतिम और अंतिम दिन, लोग देवी दुर्गा, माँ सिद्धिदात्री के नौवें अवतार की पूजा करते हैं।

आज हम आपके लिए ले कर आये हैं, Best Happy navratri wishes in hindi जिनको की आप अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ शेयर कर सकते हैं, और उन्हें भी Happy navratri 2022 की बधाई दे सकते हैं। नवरात्रि के इस पावन मौके पर आप अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को बेहतरीन कोट्स और मैसेज भेजकर विश कर सकते हैं और उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं भी दे सकते हैं।

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पग-पग में आपके फूल खिलें;

ख़ुशी आप सबको इतनी मिले;

कभी ना हो दुखों का सामना;

यही है आपको हमारी तरफ से नवरात्रि की शुभकामना।

मां की दुआओं में इतना असर हो जाए ,

कि कोरोना का कहर खत्म हो जाए।।

आपको हमारी तरफ से नवरात्रि की शुभकामना।

शेर पर सवार होकर,

खुशियों का वरदान लेकर,

हर घर में विराजी अंबे माँ,

हम सबकी जगदंबे माँ।।

नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं!

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रूठी है तो मना लेंगे

पास अपने बुला लेंगे,

मइया है वो दिल की भोली

बातों में उसे रिझा लेंगे,

Navratri 2020 Ki Hardik shubhkamnaye

सारा जहान है जिसकी शरण में

नमन है उस मां के चरण में,

हम हैं मां के चरणों की धूल

आओ मां को चढ़ाएं श्रद्धा के फूल

हैप्‍पी नवरात्रि 2020

तेरी दुनिया में भय से जब सिमट जाऊं,

चारों ओर अंधेरा ही अँधेरा घना पाऊं,

बन के रोशनी तुम राह दिखा देना।।

आपको सहपरिवार नवरात्रि की शुभकामनाएं!

गौर वर्ण और वृषभ सवारी,

अक्षय पुण्यों की हे अधिकारी,

शस्त्र त्रिशूल माँ श्वेताम्बरी,

ऐश्वर्य प्रदायिनी जय माँ महागौरी।

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हो जाओ तैयार, माँ अम्बे आने वाली हैं,

सजा लो दरबार माँ अम्बे आने वाली हैं।

तन, मन और जीवन हो जायेगा पावन,

माँ के कदमो की आहट से, गूँज उठेगा आँगन।

शुभ नवरात्री

हे मां तुमसे विश्वास ना उठने देना
बन के रोशनी तुम राह दिखा देना,
और बिगड़े काम बना देना
नवरात्रि 2020 की शुभकामनाएं

सारा जहां है जिसकी शरण में,
नमन है उस माँ के चरण में,
हम है उस माँ के चरणों की धूल,
आओ मिलकर माँ को चढ़ाएं श्रद्धा के फूल।।
आपको एवं आपके समस्त परिजनों को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं!

सारा जहां है जिसकी शरण में,

नमन है उस माँ के चरण में,

हम है उस माँ के चरणों की धूल,

आओ मिलकर माँ को चढ़ाएं श्रद्धा के फूल।।

शुभ नवरात्रि, Happy Navratri 2020

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सारा जहां है जिसकी शरण में,

नमन है उस मां के चरण में,

हम हैं उस मां के चरणों की धूल,

आओ मिलकर मां को चढ़ाएं श्रद्धा के फूल!

शुभ नवरात्रि

खुशी आप सबको इतनी मिले
कभी ना हो दुखों का सामना,
यही है हमारी तरफ से
आपको नवरात्रि की शुभकामना…
हैप्‍पी नवरात्रि 2020

तुम्ही दुर्गा, तुम्ही लक्ष्मी, तुम्ही महाकाली हो,

इस सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करने वाली हो,

शुम्भ,निशुम्भ मारे तुमने रक्तबीज संहारे है,

विक्राल रूप अपना धरकर महिसासुर भी उद्धारे हैं,

आज सम्स्त सृष्टि पाप के बोझ तले चीख रही है,

हे काली खप्पर भर लो,आस बस तेरी दीख रही है..!

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हो जाओ तैयार, मां अंबे आने वाली हैं,

सजा लो दरबार मां अंबे आने वाली हैं,

तन,मन और जीवन हो जाएगा पावन,

मां के कदमो की आहट से गूंज उठेगा आंगन..

हम पर अपनी कृपा बरसाओ माँ

एक बार फिर दर अपने बुलाओ माँ ।

जयकारे फिर गूंजे, बजे ढोल मंजीरे,

विपदा बड़ी है, चमत्कार दिखाओ माँ

तेरी शक्ति अपरंपार, तू जीवनदायिनी,

अपने आँचल में हमको छुपाओ माँ ।

करके सिंह सवारी, धरती पर आओ माँ

तेरी जय जय कार करें हम,

आपदा से बचाओ माँ ।

माँ दुर्गा के आशीर्वाद से आपका और

आपके परिवार का जीवन सदा हँसता और मुस्कुराता रहे,

प्रेम से बोलो जय माता दी।

नवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएं।

हमको था इंतजार वो घड़ी आ गई;

होकर सिंह पर सवार माता रानी आ गई;

होगी अब मन की हर मुराद पूरी;

हरने सारे दुख माता अपने द्वार आ गई..

नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं!

सजा हे दरबार, एक ज्योति जगमगाई है,

सुना हे नवरात्रि का त्योहार आया हैं,

वो देखो मंदिर में मेरी माता मुस्करायी है… जय माँ दुर्गा..

पहले माँ की पूजा, उसके बाद कोई काम दूजा,

आए हैं शुभ दिन मेरी माँ के, माँ ने मेरी हर मनोकामना पूरी की हैं..!

कुमकुम भरे कदमों से आए मां दुर्गा आपके द्वार,
सुख संपत्ति मिले आपको अपार,मेरी तरफ से नवरात्रि की एडवांस में शुभकामनाएं करें स्वीकार….

हाथ कमल और जप की माला,

गोद में जिसके शिव के लल्ला,

स्कन्द की माता,हे चेतना दाता,

कमल आसन,चतुर्हस्त माता,

जय शिव संगिनी स्कन्दमाता ।

Happy Navratri

नव दीप जले;

नव फूल खिले;

नित नयी बहार मिले;

नवरात्रि के इस पावन अवसर पर

आपको माता रानी का आशीर्वाद मिले.

हैप्पी नवरात्रि!

किस दिन कौन सी देवी की होगी पूजा
किस दिन कौन सी देवी की होगी पूजा Navratri 2020

माता का जब पर्व आता है,

ढेरों खुशियां लाता है,

इस बार मां आपको वो सब कुछ दे,

जो आपका दिल चाहता हैं.

नवरात्र की ढेर सारी शुभकामनाएं

वर्णों को रचने वाली,

१०८ नामो वाली।

श्री मंगला भद्रकाली दुखो को हरने वाली।

पापो का नाश करने वाली शक्ति दो मां कालिका काली।

चंड – मुंड विनाशिनी,

हैं!! महिषासुर घातिनी।

रक्षम रक्षम रक्षा करो मां रक्षा – रक्षा रक्षा करो मां खप्पर वाली।

Happy Navratri

हमको था जिसका इंतजार वो घड़ी आ गई,
होकर सिंह पर सवार माता रानी आ गई
शारदीय नवरात्रि की पावन शुभकामनाएं…

वो जग को चलाने वाली है,हम सबकी पालनहारी है,

कोई कहता है दुर्गा उसको, कोई कहता उसको काली है,

एक बेटी बनकर जन्म लिया, माँ-बाप कि राजदुलारी है,

एक बेटी बनकर इस घर के, आँगन की शान बढ़ा रही है,

अब निकल पड़ी है डोली उसकी, पहचान भी उसकी बदल रही है,

पापा की लाडो थी जो कभी,ये नया घर अब उसकी जिम्मेदारी है,

यू काट दिया जीवन उसने,सोचा की यही तकदीर हमारी है,

जग ने हराना चाहा हरकदम उसे, हर घडी वजूद बचा रही है,

वो जग को चलाने वाली है, वो सबला ही ये नारी है!

शुभ-नवरात्रि

Shardiya Navratri 2022 Day 2: नवरात्रि के दूसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा कैसे करें

Shardiya Navratri 2022 Day 2

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा कैसे करें- हिंदी पंचाग के अनुसार साल में नवरात्रि 4 बार मनाई जाती है | दो बार गुप्त नवरात्रि और दो नवरात्रि को मुख्य रूप से मनाया जाता है | इसमें चैत्र और शारदीय मुख्य नवरात्रि हैं, जिसे देशभर में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है | नवरात्रि का मतलब है नौ रातें | नौ दिन तक चलने वाले शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है |

देवी मां के पावन 9 दिन का पर्व शारदीय नवरात्रि आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को 26 सितम्बर 2022 से आरंभ होगा | 4 अक्टूबर तक चलने वाले इन दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है | 5 अक्टूबर को धूमधाम के साथ विजयदशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा | इसी दिन दुर्गा विसर्जन भी किया जाएगा | शास्त्रों में मां दुर्गा के नौ रूपों का बखान किया गया है | नवरात्र के दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने से विशेष पुण्य मिलता है | मान्यता है कि मां दुर्गा अपने भक्तों के हर कष्ट हर लेती हैं |

नवरात्र के नौ दिनों में मां के अलग-अलग स्वरूप की पूजा की जाती है | दूसरा दिन माता ब्रह्मचारिणी को समर्पित होता है | इसके पहले मां शैलपुत्री और इसके बाद क्रमशः चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री की आराधना होती है | नवरात्रि का दूसरा दिन देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना का दिन है | ब्रह्मचारिणी नवदुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति होती है | मां पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कई हजार वर्षों तक ब्रह्मचारी रहकर घोर तपस्या की थी | उनकी इस कठिन तपस्या के कारण उनका नाम तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी पड़ गया | वे श्वेत वस्त्र पहनती है, उनके दाएं हाथ में जपमाला तथा बाएं हाथ में कमंडल विराजमान है |

माँ ब्रह्मचारिणी की कथा:-

पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी | इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया | एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया |

कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे | तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं | इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए | कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं | पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया |

कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया | देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की | यह आप से ही संभव थी | आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे | अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ | जल्द ही आपके पिता आपको लेने आ रहे हैं | मां की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए | मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है |

पूजा विधि:-

देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा में सर्वप्रथम माता की फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें तथा उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें व देवी को प्रसाद अर्पित करें | प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें | कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें |

देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें-

इधाना कदपद्माभ्याममक्षमालाक कमण्डलु

देवी प्रसिदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्त्मा

इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को अरूहूल का फूल व कमल बेहद प्रिय होते हैं अत: इन फूलों की माला पहनायें, घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें |

Shardiya Navratri 2022 Day 7: नवरात्रि के सातंवे दिन मां कालरात्रि की पूजा कैसे करें

Shardiya Navratri 2022 Day 7

नवरात्रि का सातवां दिन मां दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित होता है | आज के दिन मां की पूजा करने से व्यक्ति को शुभ फल की प्राप्ति होती है | मां कालरात्रि की पूजा करने से आकस्मिक संकटों से रक्षा होती है |

हिंदी पंचाग के अनुसार साल में नवरात्रि 4 बार मनाई जाती है | दो बार गुप्त नवरात्रि और दो नवरात्रि को मुख्य रूप से मनाया जाता है | इसमें चैत्र और शारदीय मुख्य नवरात्रि हैं, जिसे देशभर में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है | नवरात्रि का मतलब है नौ रातें | नौ दिन तक चलने वाले शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है |

देवी मां के पावन दिन का पर्व शारदीय नवरात्रि आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को 26 सितम्बर 2022 से आरंभ होगा | अक्टूबर तक चलने वाले इन दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है | अक्टूबर को धूमधाम के साथ विजयदशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा | इसी दिन दुर्गा विसर्जन भी किया जाएगा | शास्त्रों में मां दुर्गा के नौ रूपों का बखान किया गया है | नवरात्र के दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने से विशेष पुण्य मिलता है | मान्यता है कि मां दुर्गा अपने भक्तों के हर कष्ट हर लेती हैं |

शक्ति का यह रूप शत्रु और दुष्‍टों का संहार करने वाला है | मान्‍यता है कि मां कालरात्रि ही वह देवी हैं जिन्होंने मधु कैटभ जैसे असुर का वध किया था | देवी भागवत पुराण के अनुसार, नवरात्रि के सातवें दिन मां दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा की जाती है। मां कालरात्रि सदैव अपने भक्‍तों पर कृपा करती हैं और शुभ फल देती है। इसलिए मां का एक नाम ‘शुभंकरी’ भी पड़ा |

देवी कालरात्रि का शरीर रात के अंधकार की तरह काला है | इनकी श्‍वास से अग्नि निकलती है | मां के बाल बिखरे हुए हैं इनके गले में दिखाई देने वाली माला बिजली की भांति चमकती है | इन्हें तमाम आसरिक शक्तियां का विनाश करने वाला बताया गया है |

मां कालरात्रि की कथा

कथा के अनुसार एक बार तीनों लोकों में शुम्भ निशुम्भ और रक्तबीज तीनों राक्षसों ने आतंक मचा रखा था | इससे परेशान होकर सभी देवता भगवान शिव के पास इस समस्या के समाधान के लिए पहुंचे | तब भगवान शिव ने मां आदिशक्ति से उन तीनों का संहार करके अपने भक्तों को रक्षा के लिए कहा | इसके बाद माता पार्वती ने उन दुष्टों के संहार के लिए मां दुर्गा का रूप धारण कर लिया | मां ने शुम्भ और निशुम्भ से युद्ध करके उनका अंत कर दिया |

लेकिन जैसे ही मां ने रक्तबीज पर प्रहार किया उसके रक्त से अनेकों रक्तबीज उत्पन्न हो गए | यह देखकर मां दुर्गा ने कालरात्रि का रूप धारण कर लिया | इसके बाद मां ने रक्तबीज पर प्रहार करना शुरु कर दिया और उसके रक्त को अपने मुंह में भर लिया और रक्तबीज का गला काट दिया |

मां का शरीर रात से भी ज्यादा काला है | देवी कालरात्रि के बाल बिखरे हुए हैं और मां के गले में नर मुंडों की माला विराजित है | मां के चार हाथ हैं जिनमें से एक हाथ में कटार और दूसरे में लोहे का कांटा है | देवी के तीन नेत्र हैं और इनकी सांस से अग्नि निकलती है | मां का वाहन गधा है |

मां की उपासना से लाभ

  • शत्रु और विरोधियों को नियंत्रित करनेके लिए इनकी उपासना अत्यंत शुभ होती है |
  • इनकी उपासना से भय,दुर्घटना तथा रोगों का नाश होता है |
  • इनकी उपासना से नकारात्मक ऊर्जा का ( तंत्र मंत्र) असर नहीं होता |
  • ज्योतिष में शनि नामक ग्रह को नियंत्रित करने के लिए इनकी पूजा करना अदभुत परिणाम देता है |

मां का सम्बन्ध किस चक्र से है:-

  • मां व्यक्ति के सर्वोच्च चक्र, सहस्त्रार को नियंत्रित करती हैं |
  • यह चक्र व्यक्ति को अत्यंत सात्विक बनाता है और देवत्व तक ले जाता है |
  • इस चक्र तक पहुच जाने पर व्यक्ति स्वयं ईश्वर ही हो जाता है |
  • इस चक्र पर गुरु का ध्यान किया जाता है |
  • इस चक्र का दरअसल कोई मंत्र नहीं होता |
  • नवरात्रि के सातवें दिन इस चक्र पर अपने गुरु का ध्यान अवश्य करें |

मां का मंत्र-

ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ऊं कालरात्रि दैव्ये नम:
क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं स्वाहा .