पंचायती राज व्यवस्था : जानें त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था की तीसरी इकाई जिला परिषद के बारे में

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पंचायत व्यवस्था की तीसरी इकाई
पंचायत व्यवस्था की तीसरी इकाई

जिला परिषद:- पंचायत व्यवस्था की तीसरी इकाई

जिला परिषद, पंचायती राज व्यवस्था में जिला स्तर की सबसे उच्च संस्था है जो ग्राम पंचायत एवं पंचायत समितियों के नीति-निर्धारण व मार्गदर्शन का काम करती है | 73वें संविधान संशोधन के अन्तर्गत त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में सभी राज्यों के जिले स्तर पर जिला-परिषद के गठन का प्रावधान किया गया है | जिसे कई राज्यों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है |

जैसे- उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में ‘जिला पंचायत’ तो राजस्थान, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों इसे ‘जिला परिषद‘ के नाम से जाना जाता है | जिला परिषद का नाम उस जिले के नाम पर होता है | जैसे-उत्तर प्रदेश में जिला पंचायत-आगरा और राजस्थान में जिला परिषद- अजमेर |

जिला परिषद का गठन:- पंचायत व्यवस्था की तीसरी इकाई

जिला परिषद का गठन जिला परिषद के निर्वाचित सदस्यों द्वारा की जाती है | इसके अलावा उस जिले के अंतर्गत लोकसभा और विधानसभा के निर्वाचित सदस्य भी शामिल होते हैं | लेकिन ये सदस्य जिला परिषद के अध्यक्ष के निर्वाचन में शामिल नहीं होते हैं | इन सदस्यों को स्थाई सदस्य न कहकर पदेन सदस्य कहा जाता है |

जिला पंचायत के सदस्य का चुनाव: जिला परिषद के चुनाव के लिए जिला परिषद को छोटे-छोटे ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा जाता है जिसकी आबादी लगभग 50,000 होती है | इन सदस्यों का चुनाव भी ग्रामीण मतदाता करते हैं | जिला पंचायत के सदस्य के रूप में चुने जाने के लिए जरूरी है कि प्रत्याशी की उम्र 21 साल से कम नहीं हो | यह भी जरूरी है कि चुनाव में खड़े होने वाले सदस्य का नाम उस जिले की मतदाता सूची में शामिल हो |

जिला पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव: राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार जिला परिषद के निर्वाचित सदस्य यथाशीघ्र जिला परिषद अध्यक्ष का चुनाव करते हैं | जिला परिषद में कुल चुने जाने वाले सदस्यों में से यदि किसी सदस्य का चुनाव किसी कारण से नहीं भी होता है तो भी अध्यक्ष पद के लिए चुनाव नहीं रूकता और चुने गए जिला परिषद सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का चुनाव कर लिया जाता है |

यदि कोई व्यक्ति संसद या विधान सभा का सदस्य हो, किसी नगर निगम का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष हो, नगरपालिका का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष हो या किसी नगर पंचायत का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष हो तो वह जिला परिषद अध्यक्ष या उपाध्यक्ष नहीं बन सकता |

जिला परिषद का कार्यकाल पहली बैठक की तारीख से 5 वर्षों तक का होता है | यदि किसी कारणवश जिला पंचायत को उसके निर्धारित कार्यकाल से पहले भंग कर दिया जाए तो 6 महीने के भीतर उसका चुनाव कराना जरूरी होगा | नए सदस्यों का कार्यकाल भी बाकी बचे समय के लिए ही होगा |

जिला परिषद के कार्य:-

  • जिला परिषद का वार्षिक बजट तैयार करना |
  • राज्य सरकार द्वारा जिलों को दिए गए अनुदान को पंचायत समितियों में वितरित करना | 
  • प्राकृतिक संकट के समय राहत – कार्य का प्रबन्ध करना |
  • पंचायत समितियों द्वारा तैयार की योजनाओं का समन्वय करना |
  • पंचायत समितियों तथा ग्राम पंचायतों के कार्यों का समन्वय तथा मूल्यांकन करना |
  • ग्रामीण और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देना |
  • कृषि का विकास करना |
  • लघु सिंचाई, मत्स्य पालन तथा जलमार्ग का विकास करना |
  • अनुसूचित जाति, जनजाति तथा पिछड़े वर्गों के कल्याण की योजना बनाना |
  • शिक्षा का प्रसार करना |

जिला परिषद के अंतर्गत कार्य करने वाले अधिकारी:-

  • मुख्य विकास अधिकारी
  • जिला पूर्ति अधिकारी
  • उप क्षेत्रीय विपणन अधिकारी
  • जिला वन अधिकारी
  • अधिशासी अभियन्ता- लोक निर्माण विभाग
  • अधिशासी अभियन्ता- विद्युत विभाग
  • सामान्य प्रबन्धक- जिला उद्योग केन्द्र
  • जिला अर्थ एवं संख्यिकी अधिकारी

जिला परिषद में आरक्षण:-

जिला परिषद के अध्यक्ष और जिला परिषद सदस्यों के पदों पर आरक्षण लागू होगा | पंचायती राज अधिनियम के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ी जाति के लोगों के लिए आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात पर निर्भर करता है | इसके अलावा सभी पदों पर एक तिहाई (33प्रतिशत) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखने का प्रावधान है | वर्तमान समय में कई राज्यों में महिलाओं के लिए यह आरक्षण बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है | अर्थात् इन राज्यों में पंचायती राज का प्रत्येक दूसरा पद महिलाओं के लिए आरक्षित है | ये सीटें चक्रानुक्रम या रोस्टर व्यवस्था के अनुसार आरक्षित की जाती है |

अनुसूचित, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के लोग अनारक्षित सीट पर भी चुनाव लड़ सकते हैं | इसी तरह से अगर कोई सीट महिलाओं के लिए आरक्षित नहीं की गई है तो वे भी उस सीट से चुनाव लड़ सकती हैं |

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