MP: क्या है नेचुरल फार्मिंग? किन्हें और कैसे मिलेगा इसका फायदा?

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Natural farming

Natural farming : मध्यप्रदेश सरकार नेचुरल फार्मिंग यानी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही है। किसान इसका फायदा उठा सकें, इसके लिए उनके पास देसी गाय होना जरूरी है। सरकार ने तय किया है कि नेचुरल फार्मिंग करने वाले किसान को हर महीने प्रति गाय 900 रुपए की सहायता दी जाएगी। इस तरह एक साल में किसान को 10,800 रुपए की आर्थिक सहायता राज्य सरकार उपलब्ध कराएगी। कृषि मंत्री कमल पटेल के मुताबिक 1 लाख 65 हजार किसानों ने इसमें रुचि दिखाई है। इसके लिए मध्यप्रदेश प्राकृतिक कृषि विकास बोर्ड बनाने की मंजूरी भी कैबिनेट ने दे दी है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, प्राकृतिक खेती का मुख्य आधार देसी गाय है। प्राकृतिक खेती (Natural farming) कृषि की प्राचीन पद्धति है। यह भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखती है। प्राकृतिक खेती में रासायनिक कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता है। इस प्रकार की खेती में जो तत्व प्रकृति में पाए जाते है, उन्हीं को खेती में कीटनाशक के रूप में काम में लिया जाता है।

प्राकृतिक खेती में कीटनाशकों के रूप में गोबर की खाद, कम्पोस्ट, जीवाणु खाद, फ़सल अवशेष और प्रकृति में उपलब्ध खनिज जैसे- रॉक फास्फेट, जिप्सम आदि द्वारा पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं। प्राकृतिक खेती में प्रकृति में उपलब्ध जीवाणुओं, मित्र कीट और जैविक कीटनाशक द्वारा फ़सल को हानिकारक जीवाणुओं से बचाया जाता है।

आज हम इस आर्टिकल के माध्यम से यह बतायेगे कि आखिर नेचुरल फार्मिंग होती क्या है ? नेचुरल फॉर्मिंग का फायदा किन्हें और कैसे मिलेगा ? यह जानने के लिए आप सभी लोग हमारे इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़े |  

क्या है प्राकृतिक खेती (Natural farming), और कैसी की जाती है? :

प्राकृतिक खेती कृषि की पुरातन पद्धति है। यह कई तरीकों से की जाती रही है। कई साल पहले ‘होमा खेती’ का प्रचलन था। इसमें एक निश्चित समय में खेत में हवन, मंत्रोच्चार से पवित्र कर खेती की जाती है। इसके अलावा, ब्रह्मांडीय शक्तियों सूर्य, चांद आदि की ऊर्जा का ध्यान रखा जाता है। प्राकृतिक खेती को इस तरह से देखा जाता है कि खेत में फसल की बुवाई करो और काटो। न उर्वरक का उपयोग करें, न ही रसायन का उपयोग करें। फसल की शुद्धता और मिट्‌टी के स्वास्थ्य की दृष्टि से इसे बढ़ावा दिया जा रहा है।

प्राकृतिक खेती में कीटनाशकों के रूप में गोबर की खाद, कम्पोस्ट, जीवाणु खाद, फ़सल अवशेष और प्रकृति में उपलब्ध खनिज जैसे- रॉक फास्फेट, जिप्सम आदि द्वारा पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं। प्राकृतिक खेती में प्रकृति में उपलब्ध जीवाणुओं, मित्र कीट और जैविक कीटनाशक द्वारा फ़सल को हानिकारक जीवाणुओं से बचाया जाता है।

प्राकृतिक खेती की आवश्यकता (need for natural farming) :

  1. पिछले कई वर्षों से खेती में काफी नुकसान देखने को मिल रहा है। इसका मुख्य कारण हानिकारक कीटनाशकों का उपयोग है। इसमें लागत भी बढ़ रही है। 
  2. भूमि के प्राकृतिक स्वरूप में भी बदलाव हो रहे है जो काफी नुकसान भरे हो सकते हैं। रासायनिक खेती से प्रकृति में और मनुष्य के स्वास्थ्य में काफी गिरावट आई है। 
  3. किसानों की पैदावार का आधा हिस्सा उनके उर्वरक और कीटनाशक में ही चला जाता है। यदि किसान खेती में अधिक मुनाफा या फायदा कमाना चाहता है तो उसे प्राकृतिक खेती की तरफ अग्रेसर होना चाहिए।
  4. खेती में खाने पीने की चीजे काफी उगाई जाती है जिसे हम उपयोग में लेते है। इन खाद्य पदार्थों में जिंक और आयरन जैसे कई सारे खनिज तत्व उपस्थित होते है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक होती है। 
  5. रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग से ये खाद्य पदार्थ अपनी गुणवत्ता खो देते है। जिससे हमारे शरीर पर बुरा असर पड़ता है।
  6. रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग से जमीन की उर्वरक क्षमता खो रही है। यह भूमि के लिए बहुत ही हानिकारक है और इससे तैयार खाद्य पदार्थ मनुष्य और जानवरों की सेहत पर बुरा असर डाल रहे है।
  7. रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग से मिट्टी की उर्वरक क्षमता काफी कम हो गई। जिससे मिट्टी के पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ गया है। इस घटती मिट्टी की उर्वरक क्षमता को देखते हुए जैविक खाद उपयोग जरूरी हो गया है।

प्राकृतिक खेती (Natural Farming) के लिए कैसे मिलेगी मदद :

जिला परियोजना संचालक के जरिए नेचुरल फार्मिंग से जुड़े कार्य किए जाएंगे। इसके लिए किसान को आवेदन देना होगा। जिसका प्रारूप सरकार द्वारा जारी किया जाएगा। इसमें उसे घोषित करना होगा कि वह कितनी जमीन पर नेचुरल खेती करना चाहता है। इसके बाद उसे सरकारी से मदद मिल सकेगी।

प्राकृतिक खेती (Natural Farming) के लिए कौन-कौन से किसान इस दायरे में आएंगे?

सिर्फ वही किसान दायरे में आएंगे, जो प्राकृतिक खेती करेंगे। अन्य पद्धति से खेती करने पर उन्हें देसी गाय के लिए 900 रुपए का भुगतान नहीं किया जाएगा।

कौन -कौन सी किस्म की गायें देसी मानी जाती हैं?:

56 तरह की भारतीय नस्ल की गाय देसी कैटेगरी में आएंगी। इसमें मालवी, निमाड़ी, गीर, थारपारकर, नागौरी, कांकरेज, साहीवाल आदि नस्ल की गायें शामिल हैं। मध्यप्रदेश में मूल रूप से मालवी, निमाड़ी और गुजरात की गीर गाय अधिक हैं। खास बात यह है कि एक देसी गाय से 30 एकड़ जमीन पर प्राकृतिक खेती की जा सकती है। यानी इसके गोबर और मूत्र से ही जीवामृत और घन जीवामृत बनाए जा सकते हैं।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्र दोनों में गाय पालने पर मिलेगी सहायता राशि :

ग्रामीण क्षेत्र के किसान हों या शहरी क्षेत्र के, जो भी प्राकृतिक खेती करेगा, उन्हें देसी गाय पालने के लिए 900 रुपए प्रति गाय के हिसाब से भुगतान किया जाएगा।

वेरिफिकेशन का सिस्टम :

हर ब्लॉक में 5-5 पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। यह न सिर्फ ट्रेनिंग देंगे, बल्कि इस बात को भी देखेंगे कि प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को ही गाय पालन की सरकारी सहायता मिल रही है।

सरकार का टारगेट :

हर जिले में कम से कम 100 गांवों को चिन्हित किया जाएगा। इस तरह प्रदेश के 52 जिलों में 5200 गांवों में खरीफ की फसल की प्राकृतिक खेती कराने का लक्ष्य है। विशेष रूप से नर्मदा नदी के किनारे इसे प्रमोट किया जाएगा। इसके लिए सीएम, कृषि मंत्री भी प्राकृतिक खेती करेंगे।

प्राकृतिक कृषि विकास बोर्ड का रोल :

बोर्ड का मुख्यालय भोपाल में होगा। मध्यप्रदेश प्राकृतिक कृषि विकास बोर्ड में निगरानी एवं समीक्षा के लिए राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में शीर्ष निकाय और मुख्य सचिव की अध्यक्षता में टास्क फोर्स का गठन होगा। बोर्ड के राज्य परियोजना संचालक अपर मुख्य सचिव, किसान-कल्याण, कृषि विकास विभाग और कार्यकारी संचालक, संचालक कृषि होंगे। जिला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में आत्मा गवर्निंग बोर्ड के निर्देशन में जिला परियोजना संचालक आत्मा द्वारा योजना क्रियान्वित की जाएगी।

साथ ही अन्य प्रकार की सहायता भी सरकार देगी?:

किसानों की मदद और मार्गदर्शन के लिए प्राकृतिक खेती के लिए कार्यशालाएं कराई जाएंगी। किसानों को नेचुरल खेती की बारीकी सिखाई जाएगी। प्राकृतिक कृषि किट लेने के लिए 75% तक राशि भी उपलब्ध कराई जाएगी।

प्राकृतिक खेती के चार सिद्धांत :

1. खेतों में कोई जोताई नहीं करना। यानी न तो उनमें जुताई करना, और न ही मिट्टी पलटना। 

2. किसी भी तरह की तैयार खाद या रासायनिक उर्वरकों का उपयोग न किया जाए

3. निंदाई-गुड़ाई न की जाए। न तो हलों से न शाकनाशियों के प्रयोग द्वारा

4. रसायनों पर बिल्कुल निर्भर न करना

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