कौन थीं अह‍िल्याबाई होलकर? जिसे इंदौर की देवी कहा जाता है जानिए यहाँ पर…

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अह‍िल्याबाई होलकर

इंदौर का नाम आते ही देवी अहिल्या का नाम सबसे पहले आता है। देवी अहिल्या ने अपने शासनकाल में ऐसे फैसले लिए जिन्हें जानकर आप हैरान रह जाएंगे। उनमें जितनी शिवभक्ति थी, प्रजा के लिए वे जितनी मृदुभाषी थीं, राजपाट के नियमों में उतनी ही सख्त थीं। नियमों के पालन के मामले में वह अपने पति-पुत्र के प्रति भी सख्त रहती थीं।

देवी अहिल्या ने 13 मार्च 1767 को रियासत की कमान अपने हाथों में ली थी। वे जनता की गाढ़ी कमाई बचाने के लिए एक-एक आने का हिसाब रखती थीं। 28 बरस के अपने शासनकाल में उन्होंने देशभर में 65 मंदिर, धर्मशालाएं, सड़कें, तालाब और नदियों के भव्य घाट बनवाए। बताते हैं कि वे शिव की इतनी अनन्य भक्त थीं कि रियासत के हर ऑर्डर पर हुजूर शंकर लिखा जाता था।

अहिल्याबाई होल्कर, जीवनी :

अहिल्याबाई होल्कर (1725-1795) एक महान शासक थी और मालवा प्रांत की महारानी। लोग उन्हें राजमाता अहिल्यादेवी होल्कर नाम से भी जानते हैं और उनका जन्म महाराष्ट्र के चोंडी गांव में 1725 में हुआ था। उनके पिता मानकोजी शिंदे खुद धनगर समाज से थे, जो गांव के पाटिल की भूमिका निभाते थे।

अह‍िल्याबाई होलकर

उनके पिता ने अहिल्याबाई को पढ़ाया-लिखाया। अहिल्याबाई का जीवन भी बहुत साधारण तरीके से गुजर रहा था। लेकिन एकाएक भाग्य ने पलटी खाई और वह 18वीं सदी में मालवा प्रांत की रानी बन गईं।

युवा अहिल्यादेवी का चरित्र और सरलता ने मल्हार राव होल्कर को प्रभावित किया। वे पेशवा बाजीराव की सेना में एक कमांडर के तौर पर काम करते थे। उन्हें अहिल्या इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने उनकी शादी अपने बेटे खांडे राव से करवा दी।

इस तरह अहिल्या बाई एक दुल्हन के तौर पर मराठा समुदाय के होल्कर राजघराने में पहुंची। उनके पति की मौत 1754 में कुंभेर की लड़ाई में हो गई थी। ऐसे में अहिल्यादेवी पर जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने अपने ससुर के कहने पर न केवल सैन्य मामलों में बल्कि प्रशासनिक मामलों में भी रुचि दिखाई और प्रभावी तरीके से उन्हें अंजाम दिया।

मल्हारराव के निधन के बाद उन्होंने पेशवाओं की गद्दी से आग्रह किया कि उन्हें क्षेत्र की प्रशासनिक बागडोर सौंपी जाए। मंजूरी मिलने के बाद 1766 में रानी अहिल्यादेवी मालवा की शासक बन गईं।

उन्होंने तुकोजी होल्कर को सैन्य कमांडर बनाया। उन्हें उनकी राजसी सेना का पूरा सहयोग मिला। अहिल्याबाई ने कई युद्ध का नेतृत्व किया। वे एक साहसी योद्धा थी और बेहतरीन तीरंदाज। हाथी की पीठ पर चढ़कर लड़ती थी। हमेशा आक्रमण करने को तत्पर भील और गोंड्स से उन्होंने कई बरसों तक अपने राज्य को सुरक्षित रखा।

रानी अहिल्याबाई अपनी राजधानी महेश्वर ले गईं. वहां उन्होंने 18वीं सदी का बेहतरीन और आलीशान अहिल्या महल बनवाया। पवित्र नर्मदा नदी के किनारे बनाए गए इस महल के ईर्द-गिर्द बनी राजधानी की पहचान बनी टेक्सटाइल इंडस्ट्री।

उस दौरान महेश्वर साहित्य, मूर्तिकला, संगीत और कला के क्षेत्र में एक गढ़ बन चुका था। मराठी कवि मोरोपंत, शाहिर अनंतफंडी और संस्कृत विद्वान खुलासी राम उनके कालखंड के महान व्यक्तित्व थे।

एक बुद्धिमान, तीक्ष्ण सोच और स्वस्फूर्त शासक के तौर पर अहिल्याबाई को याद किया जाता है। हर दिन वह अपनी प्रजा से बात करती थी। उनकी समस्याएं सुनती थी। उनके कालखंड (1767-1795) में रानी अहिल्याबाई ने ऐसे कई काम किए कि लोग आज भी उनका नाम लेते हैं।

अपने साम्राज्य को उन्होंने समृद्ध बनाया। उन्होंने सरकारी पैसा बेहद बुद्धिमानी से कई किले, विश्राम गृह, कुएं और सड़कें बनवाने पर खर्च किया। वह लोगों के साथ त्योहार मनाती और हिंदू मंदिरों को दान देती।

एक महिला होने के नाते उन्होंने विधवा महिलाओं को अपने पति की संपत्ति को हासिल करने और बेटे को गोद लेने में मदद की।  इंदौर को एक छोटे-से गांव से समृद्ध और सजीव शहर बनाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कई मंदिरों का जीर्णोद्धार किया।

उनका सबसे यादगार काम रहा, तकरीबन सभी बड़े मंदिरों और तीर्थस्थलों पर निर्माण। हिमालय से लेकर दक्षिण भारत के कोने-कोने तक उन्होंने इस पर खूब पैसा खर्च किया। काशी , गया, सोमनाथ, अयोध्या,  मथुरा , हरिद्वार, द्वारका, बद्रीनारायण, रामेश्वर और जगन्नाथ पुरी के ख्यात मंदिरों में उन्होंने खूब काम करवाए।

अहिल्याबाई होल्कर का चमत्कृत कर देने वाले और अलंकृत शासन 1795 में खत्म हुआ, जब उनका निधन हुआ। उनकी महानता और सम्मान में भारत सरकार ने 25 अगस्त 1996 को उनकी याद में एक डाक टिकट जारी किया।

इंदौर के नागरिकों ने 1996 में उनके नाम से एक पुरस्कार स्थापित किया। असाधारण कृतित्व के लिए यह पुरस्कार दिया जाता है। इसके पहले सम्मानित शख्सियत नानाजी देशमुख थे।

अहिल्या बाई होल्कर के बारे में तथ्य :

पूरा नामअहिल्या बाई साहिबा होल्कर
जन्म31 मई, 1725, ग्राम चौंडी, जामखेड़, अहमदनगर, महाराष्ट्र, भारत
धर्महिंदू
उनके बारे मेंमहारानी अहिल्या बाई होल्कर भारत में मालवा प्रांत की महारानी थी।
पतिखांडेराव होल्कर
पितामानकोजी शिंदे
घरानाहोल्कर घराना
राज्याभिषेक11 दिसंबर 1767
शासन1 दिसंबर 1767 से 13 अगस्त 1795 तक
पूर्वजमालेराव होल्कर
उत्तराधिकारीतुकोजीराव होल्कर प्रथम
ससुरमल्हार राव होल्कर
पति का निधनपति की मौत कुंभेर युद्ध के दौरान 1754 में हुई थी।

अहिल्या बाई होल्कर के बारे में रोचक किस्से :

संपत्तियों की देखरेख का बोझ जनता पर न पड़े इसलिए ट्रस्ट बनाया:

होलकर रियासत की संपत्ति की देखरेख का बोझ जनता पर नहीं पड़े, इसके लिए खासगी ट्रस्ट बनाया। ट्रस्ट के खाते में 16 करोड़ रुपए जमा हो गए तो देवी अहिल्या ने इससे देश में मंदिर, धर्मशालाएं बनवाईं।

 पारिवारिक खर्च जनता के पैसों से नहीं, व्यक्तिगत कोष से :

होलकर परिवार के सारे खर्च राजकोष (दौलत) से नहीं किए जाते थे। जब ससुर मल्हार राव के अभिन्न मित्र बाजीराव पेशवा का निधन हुआ तो सारे क्रियाकर्म का खर्च राजकोष से करना चाहा तो बहू देवी अहिल्या ने ससुर को रोक दिया और कहा- यह खर्च मना कर दिया। यह खर्च पारिवारिक कोष (खासगी ट्रस्ट) से ही होगा।

युद्ध में जीते धन पर सबसे पहला हक राजकोष का :

पति तक को कह दिया था कि जब तक आप अग्रिम वेतन चुका न देंगे, एक नया पैसा नहीं मिलेगा। पति खंडेराव के कक्ष में जीत में मिले धन को देख कहा, इस पर भी पहला हक राजकोष का है।

जमीन विवाद आने लगे तो बना दिया खसरा नियम :

जमीन के विवाद खड़े होने लगे तो अहिल्यादेवी ने खसरा व्यवस्था लागू की। आवेदकों से जमीन पर लंबाई में 7 फलदार पेड़ और चौड़ाई में 12 फलदार पेड़ लगाने को कहा। इस तरह विभाजन बराबर हुआ।

भगवान शिव की अनन्य भक्त : 

देवी अहिल्या शिव की अनन्य उपासक रहीं। होश संभालने के बाद से मृत्यु शैया तक महादेव के लिए समर्पित रहीं। बचपन में एक बार जब वह मंदिर जा रही थीं, तभी औरंगाबाद परगने के ग्राम चौंडी में आए मल्हारराव होलकर की नजर उन पर पड़ी।

गोल सुंदर चेहरे वाली वाली उस 8-10 वर्षीय बालिका के हाथ में पूजा की थाली, उन्नत ललाट, खिंची हुई भृकुटी, मनोहर नासिका और बड़ी आंखों में कुछ ऐसा आकर्षण था कि मल्हारराव वहीं रुक गए।

वे देवी अहिल्या के पिता मनकोजी तथा माता सुशीलाबाई शिंदे के घर पहुंचे और अपने पुत्र के लिए अहिल्या का हाथ मांग लिया। यह संबंध बनते देर न लगी और 31 मई 1725 को जन्मी अहिल्या का विवाह 1735 में खंडेराव से हुआ।

अपने ही बेटे को कुचलने के लिए हो गईं थीं रथ पर सवार :

अहिल्या बाई को न्याय की देवी कहा जाता था. एक बार की घटना का जिक्र उन्हें लेकर बहुत प्रचलित है , इसके अनुसार अहिल्याबाई के बेटे मालोजी राव एक बार अपने रथ से सवार होकर राजबाड़ा के पास से गुजर रहे थे.

तभी रास्ते में एक गाय का छोटा-सा बछड़ा खेल रहा था लेकिन जैसे ही मालोराव का रथ वहां से गुजरा वो बछड़ा कूदता-फांदता रथ की चपेट में आकर बुरी तरह घायल हो गया बस चंद मिनटों में तड़प-तड़प कर बछड़ा मर गया |

बताते हैं कि मालोजी राव ने इस घटना पर ध्यान नहीं दिया और अपने रथ समेत आगे बढ़ने लगे वो गाय अपने बछड़े के पास पहुंची और बछड़े को मरा हुआ देखकर वहीं सड़क पर बैठ गई. तभी वहां से अहिल्याबाई का रथ गुजरा. वो ये नजारा देखकर वहीं ठ‍िठक गईं. आसपास के लोगों से पूछने लगीं कि ये घटना कैसे हुई. किसने बछड़े के साथ ये किया |

कोई भी उनके बेटे का नाम लेते हुए डर रहा था. किसी को ये हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि वो मालोजी राव का नाम बताए फिर किसी ने हिम्मत करके उन्हें घटना का पूरा वृतांत सुनाया. अहिल्याबाई इस बात से क्रोध‍ित होकर सीधे अपने घर पहुंचीं वहां अपनी बहू को बुलाया.

उन्होंने अपनी बहू से पूछा कि अगर कोई मां के सामने उसके बेटे पर रथ चढ़ा दे और रुके भी नहीं तो क्या करना चाहिए उनके इस सवाल पर उनकी बहू मेनाबाई ने कहा कि ऐसे आदमी को मृत्युदंड देना चाहिए|

बहू की बात सुनकर वो काफी देर सोचती रहीं. फिर जब वो सभा में पहुंचीं तो आदेश दिया कि उनके बेटे मालोजीराव के हाथ-पैर बांध दिए जाएं और उन्हें ठीक वैसे ही रथ से कुचलकर मृत्यु दंड दिया जाए, जैसे गाय के बछड़े की मौत हुई थी.

अहिल्या बाई के इस आदेश से सभी एकदम सहम गए. उनके आदेश को मानने की हिम्मत किसी में नहीं दिख रही थी कोई भी उस रथ की लगाम पकड़ने को तैयार नहीं हुआ. वो काफी देर इंतजार के बाद खुद उठीं और आकर रथ की लगाम थाम लीं लेकिन जैसे ही वो रथ को आगे बढ़ाने लगीं, तभी एक ऐसी घटना हुई जिसने सभी को मन से झकझोर दिया.

क्योंकि जैसे ही वो रथ को आगे बढ़ा रही थीं तभी वही गाय आकर उनके रथ के सामने खड़ी हो गई उन्होंने उस गाय को रास्ते से हटाने के लिए कहा, लेकिन वो बार बार आकर रथ के सामने खड़ी हो जाती इस घटना से प्रभावित दरबारी और मंत्रियों ने कहा कि आप इस गाय का इशारा समझ‍िए, वो भी चाहती है कि आप बेटे पर दया करें. किसी मां को अपने बेटे के खून से अपने हाथ नहीं रंगने देना चाह रही. सभी ने कहा कि मालोजी राव अब बहुत कुछ सीख चुके हैं. वो कभी भविष्य में ऐसी घटना नहीं दोहराएंगे |

उपलब्धियां:

अहिल्याबाई ने इंदौर को एक छोटे-से गांव से खूबसूरत शहर बनाया। मालवा में कई किले और सड़कें बनवाईं। उन्होंने कई घाट, मंदिर, तालाब, कुएं और विश्राम गृह बनवाए।

न केवल दक्षिण भारत में बल्कि हिमालय पर भी। सोमनाथ, काशी, गया, अयोध्या, द्वारका, हरिद्वार, कांची, अवंती, बद्रीनारायण, रामेश्वर, मथुरा और जगन्नाथपुरी आदि।

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