Rocket Boys Review: देश की तकदीर बदल देने वाले दो लड़कों डॉ.विक्रम साराभाई और डॉ.होमी जहांगीर भाभा की कहानी

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Rocket Boys Review
Rocket Boys Review in Hindi

Rocket Boys Review:-

आज यह कहने-सुनने में गर्व होता है कि भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में बड़ी ऊंचाइयां हासिल की हैं | चांद पर अपना यान उतार दिया है, मंगल तक यान भेज दिया है | साथ ही आज हम विश्व की प्रमुख परमाणु शक्ति भी हैं | मगर यह कोई रातों रात हुआ चमत्कार नहीं है |

इसके पीछे देश के भविष्य को देखने वाली दृष्टि से लेकर भारत को विश्व में सम्मानजनक स्थिति दिलाने की दृढ़ इच्छाशक्ति वाले वैज्ञानिक, विचारक और राष्ट्रीय नेता शामिल हैं | Sony LIV पर रिलीज हुई Web Series Rocket Boys यहां उन दो महान वैज्ञानिकों की कहानी कहती है, जिन्होंने सोते-जागते भारत के लिए संपन्न, समृद्ध, स्वाभिमानी और सशक्त भविष्य के सपने देखे | ये Rocket Boys हैं, भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा और भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की संकल्पना करने वाले डॉ. विक्रम साराभाई |

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Movie Reviewरॉकेट ब्वॉयज (Rocket Boys)
कलाकारजिम सर्भ , इश्वाक सिंह , रेजिना कसांड्रा , सबा आजाद , दिब्येंदु भट्टाचार्य , रजित कपूर , नमित दास और अर्जुन राधाकृष्णन
लेखकअभय कोराने , अभय पन्नू और कौसर मुनीर
निर्देशकअभय पन्नू
निर्मातारॉय कपूर फिल्म्स और एम्मे एंटरटेनमेंट
OTTSony LIV
फोटोग्राफी के निर्देशकहर्षवीर ओबेराई
Rocket Boys Review

क्या है Rocket Boys की कहानी:-

आपको बता दे यह एक पीरियड ड्रामा दो असाधारण भारतीय भौतिकविदों-डॉ. होमी जहांगीर भाभा (जिम सर्भ) और डॉ विक्रम अंबालाल साराभाई (इश्वाक सिंह) – जिन्होंने भारत के भविष्य का निर्माण करते हुए इतिहास रचा |

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Rocket Boys Season 1 Review in Hindi:-

आपको बता दे ‘रॉकेट बॉयज‘ दो महान भौतिकविदों, डॉ. होमी जहांगीर भाभा की कहानी कहता है, जिन्हें बोलचाल की भाषा में “भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक” के रूप में जाना जाता है – जो भारत में रहने और सीवी रमन के भारतीय संस्थान में शामिल होने से पहले कैम्ब्रिज में एक विज्ञान शोधकर्ता थे | उन्होंने मुंबई में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BRC) की स्थापना और नेतृत्व करने से पहले टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) में भौतिकी के प्रोफेसर के रूप में काम किया | और डॉ विक्रम अंबालाल साराभाई– को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के पिता” के रूप में माना जाता है |

करीब 40-40 मिनिट की आठ कड़ियों वाली रॉकेट बॉय्ज की कहानी शुरू होती है 1962 में चीन के हाथों भारत की सैन्य पराजय के साथ | तब होमी (जिम सारभ) तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू (रजित कपूर) से कहते हैं कि जरूरी नहीं कि चीन भविष्य में हमलावर नहीं होगा, इसलिए जरूरी है कि हम परमाणु बम बनाएं | नेहरू असमंजस में हैं | होमी के मित्र और कभी उनके छात्र रहे विक्रम साराभाई (इश्वाक सिंह) परमाणु बम बनाए जाने का खुला विरोध करते हैं क्योंकि दुनिया दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराए परमाणु बमों से हुई तबाही देख चुकी है | होमी और विक्रम के इस टकराव के साथ कहानी फ्लैशबैक में 1930 के दशक में चली जाती है और फिर दोनों का जीवन यहां से आकार लेता नजर आता है |

होमी विश्व युद्ध के दौरान भारत लौट कर कलकत्ता के एक साइंस कॉलेज में प्रोफेसर हो जाते हैं, जबकि विक्रम कैंब्रिज में अपना रिसर्च छोड़ कर घर आ जाते हैं | होमी जहां परमाणु विज्ञान में दिलचस्पी रखते हैं, वहीं विक्रम की सपना देश का पहला रॉकेट बनाने का है | अपनी चाल चलता समय दोनों को एक मुकाम पर लाता है और वे मिल कर काम करते हैं | जहां होमी प्रोफेसर हैं और विक्रम उनके स्टूडेंट | धीरे-धीरे दोनों दोस्त बन जाते हैं | बावजूद इसके कि दोनों के विचार कई मुद्दों पर मेल नहीं खाते और तकरार लगातार चलती है, उनकी दोस्ती बरकरार रहती है | दोनों के व्यक्तित्व यहां विरोधाभासी नजर आते हैं |

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1942 में महात्मा गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन से प्रभावित होकर होमी और विक्रम कॉलेज में एक दिन अंग्रेजों का यूनियन जैक उतार कर स्वराज का तिरंगा लहरा देते हैं और उनका मुश्किल वक्त शुरू होता है | होमी कॉलेज से अपनी नौकरी छोड़ कर मुंबई चले जाते हैं और जेआरडी टाटा के साथ उनका नया सफर शुरू होता है | दूसरी तरफ विक्रम पढ़ाई के साथ-साथ कपड़ा मिल मालिक पिता के कारोबार में हाथ बंटाने लगते हैं | वे कपड़ा मिलों को आधुनिक बनाना चाहते हैं लेकिन यूनियन लीडरों का विरोध सहना पड़ता है | ऐसे में उनका रॉकेट बनाने का सपना पीछे चला जाता है | रॉकेट बॉय्ज की कहानी यहां से दोनों महान-मस्तिष्कों की उलझनों, सपनों को साकार करने में आने वाली रुकावटों, निजी जिंदगी के उतार-चढ़ावों और भावनात्मक उथल-पुथल को सामने लेकर आती है | विक्रम जहां एक डांसर मृणालिनी (रेजिना कैसेंड्रा) से प्रेम में पड़ कर विवाह कर लेते हैं, वहीं वकील पीप्सी (सबा आजाद) से होमी की मोहब्बत अधूरी रहती है | यहां सीवी रमन और एपीजे अब्दुल कलाम (अर्जुन राधाकृष्णन) जैसे महान वैज्ञानिक भी कहानी का हिस्सा बन कर आते हैं | हालांकि फोकस इन पर नहीं है |

दो सफल वैज्ञानिक की रियल लाइफ पर है आधारित स्टोरी (Rocket Boys Review):-

निखिल आडवाणी, रॉय कपूर फिल्म्स और एम्मे एंटरटेनमेंट द्वारा बनाया गया यह जीवनी पर आधारित काल्पनिक नाटक, शुरू से ही लुभावना है, सफलतापूर्वक अतीत के प्रतिष्ठित क्षणों को फिर से बना रहा है, विशेष रूप से वे जो स्वतंत्रता से पहले और बाद के युग में हुए थे | अभय कोराने की अवधारणा इन वैज्ञानिकों की वास्तविक जीवन की घटनाओं और नए स्वतंत्र और संघर्षरत देश को प्रौद्योगिकी पथ में आगे बढ़ाने के उनके प्रयासों को बताते हुए दर्शकों के लिए गहन और प्रेरक दोनों है |

पहले ‘मुंबई डायरीज‘, ‘ये मेरी फैमिली‘ जैसे शो में सहायक निर्देशक के रूप में काम कर चुके लेखक-निर्देशक अभय पन्नू की आठ-भाग वाली श्रृंखला एक विस्मयकारी कहानी है जो उन दोनों की वास्तविक जीवन की घटनाओं को दर्शाती है जो पहले दोस्त बने थे | और भारत के परमाणु कार्यक्रम पर काम करने की कल्पना की |

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यह विक्रम साराभाई के शुरुआती जीवन और संघर्षों का वर्णन करता है, जिन्होंने अपने कॉलेज परिसर में प्रयोग करना शुरू किया, और होमी भाभा, एक विज्ञान प्रोफेसर, जो साराभाई के विचारों और चल रहे प्रयोगों से प्रभावित हैं, और कैसे वे भारत को परमाणु शक्ति बनाने के लिए अपनी यात्रा शुरू करते हैं और कैसे शुरू करते हैं |

ए पी जे अब्दुल कलाम का भी ही अहम् रोल (Rocket Boys Review):-

बाद के एपिसोड में एक नवोदित वैज्ञानिक पर भी प्रकाश डाला गया, कोई और नहीं बल्कि खुद ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (अर्जुन राधाकृष्णन) द्वारा निबंधित थे, जिन्होंने अंतरिक्ष में पहले रॉकेट लॉन्च पर साराभाई के साथ मिलकर काम किया था | यह उस भूमिका को भी दर्शाता है जो पूर्व प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू (रजित कपूर) ने भारत के परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में निभाई थी | इसके अतिरिक्त, पटकथा में ऐतिहासिक कतरनें शामिल हैं जो 1940 और 1960 के दशक की शुरुआत में हुई घटनाओं को प्रमाणित करने के लिए कथा के साथ चलती हैं |

यहां दो लोगों का विशेष रूप से उल्लेख किया जाना चाहिए: फोटोग्राफी के निर्देशक हर्षवीर ओबेराई, जिन्होंने स्वतंत्रता से पहले और बाद के युगों को फिर से बनाया, और संपादक माहिर जावेरी, जिनकी सटीक कटौती समयरेखा के बीच कथा को तेजी से स्थानांतरित करने में सहायता करती है | इसके अतिरिक्त, उमा बीजू और बीजू एंटनी द्वारा पुराने कपड़ों के आउटफिट ने युग को फिर से बनाने और कहानी में एक यथार्थवादी दिखने वाले तत्व को जोड़ने में मदद की |

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