Dhanteras 2022: जानिए धनतेरस से जुड़ी पौराणिक कथाओं के बारे में, क्यों मनाया जाता है धनतेरस का पर्व?

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Dhanteras 2021
Dhanteras 2021 Date

धनतेरस से जुडी पौराणिक कथाएं 2022:-

भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य को धन से ऊपर माना गया है | एक प्राचीन कहावत है जो आज भी प्रचलित है कि ‘पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में माया‘ | धनतेरस का दिन धन्वन्तरि त्रयोदशी या धन्वन्तरि जयन्ती, जो कि आयुर्वेद के देवता का जन्म दिवस है, के रूप में भी मनाया जाता है, धनतेरस से जुडी पौराणिक कथाएं |

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान धन्वंतरि विष्णु के अंशावतार माने जाते हैं | संसार में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार और प्रसार के लिए ही भगवान विष्णु ने ये अवतार लिया था। भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने के उपलक्ष्य में ही धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है |

धनतेरस से जुडी पौराणिक कथाएं:-

समुद्र मंथन के दौरान, अमृत का कलश लेकर भगवान् धनवंतरी प्रकट हुए थे | इस कारण इस दिन को धनतेरस के रूप में मनाया जाने लगा | धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, धनवंतरी के प्रकट होने के ठीक दो दिन बाद मां लक्ष्मी प्रकट हुईं थीं | यही कारण है कि हर बार दिवाली से दो दिन पहले ही धनतेरस मनाया जाता है |

इस दिन स्वास्थ्य रक्षा के लिए धनवंतरी देव की उपासना की जाती है | इस दिन को कुबेर का दिन भी माना जाता है और धन संपन्नता के लिए कुबेर की पूजा की जाती है |

धनतेरस से जुडी पौराणिक कथाएं

लक्ष्मी चंचला हैं:-

एक कथा के अनुसार एक बार भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने आ रहे थे | तब लक्ष्मीजी ने भी उनके साथ चलने का आग्रह किया | विष्णु जी ने कहा ठीक है पर मैं आपसे जो कहूं वह आप मानेंगी तो आप मेरे साथ चल सकती हैं | लक्ष्मीजी उनकी बात मान गईं और भगवान विष्णु के साथ धरती पर आ गईं |

कुछ देर बाद एक स्थान पर पहुंच कर भगवान विष्णु ने लक्ष्मीजी से कहा कि जब तक मैं न आऊं तुम यहां ठहरो | मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत आना | विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी के मन में कौतुहल जागा कि आखिर दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है, जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं चले गए |

लक्ष्मीजी से रहा नहीं गया और जैसे ही भगवान आगे बढ़े लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं | कुछ ही आगे जाने पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया जिसमें खूब फूल लगे थे | सरसों की शोभा देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गईं और फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बढ़ीं | आगे जाने पर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मीजी गन्ने तोड़कर रस चूसने लगीं |

उसी क्षण विष्णु जी आ गए और यह देख लक्ष्मीजी पर नाराज होकर उन्हें शाप दे दिया कि जब मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानी और किसान के खेत में चोरी का अपराध कर बैठी | अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो | ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए | लक्ष्मीजी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं |

एक दिन लक्ष्मीजी ने उस किसान की पत्नी से कहा कि तुम स्नान कर पहले मेरी बनाई गई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तब तुम जो मांगोगी मिलेगा | किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया | पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया | लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया |

किसान के 12 वर्ष बड़े आनंद से कट गए | फिर 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं | विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया | तब भगवान ने किसान से कहा कि इन्हें कौन जाने देता है, यह तो चंचला हैं, कहीं नहीं ठहरतीं | इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके | इनको मेरा शाप था इसलिए 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं | तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है |

धनतेरस से जुडी पौराणिक कथाएं

राजा बलि से जुडी एक कथा:-

राजा बलि के भय से देवताओं को मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था | राजा बलि एक दानवीर राजा थे | स्वर्ग पर विजय पाने के लिए वह यज्ञ कर रहे थे | उस यज्ञ स्थल पर भगवान विष्णु वामन अवतार में जा पहुंचे |

लेकिन असुरों के गुरु शुक्राचार्य पहचान गए कि वामन के रूप में भगवान विष्णु ही हैं | इसलिए उन्होंने राजा बलि से कहा कि वामन जो भी मांगे वो उन्हें ना दिया जाए | साथ ही उन्होंने कहा कि वामन के रूप में भगवान विष्णु हैं, जो देवताओं की सहायता करने के लिए यहां आए हैं |

लेकिन राजा बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं सुनी और वामन भगवान द्वारा मांगी गई तीन पग भूमि दान करने के लिए तैयार हो गए | लेकिन शुक्राचार्य ऐसा नहीं चाहते थे, इसलिए राजा बलि को दान करने से रोकने के लिए शुक्राचार्य ने उनके कमंडल में लघु रूप धारण करके प्रवेश कर लिया था |

लेकिन भगवान वामन भी शुक्राचार्य के छल को समझ गए थे, जिसके बाद उन्होंने अपने हाथों में मौजूद कुशा को कमंडल में इस तरह रखा कि शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई |

कहा जाता है कि इसके बाद भगवान द्वारा मांगी गई तीन पग भूमि को बलि ने दान करने का निर्णय ले लिया | उस समय भगवान वामन ने अपने एक पैर से पूरी धरती को नापा और दूसरे पैर से अंतरिक्ष को नाप लिया | लेकिन तीसरा पैर रखने के लिए कुछ स्थान नहीं बचा था, जिसके बाद बलि ने वामन भगवान के चरणों में अपना सिर रख दिया था |

देवताओं को बलि के भय से इस तरह मुक्ति मिल गई थी | इसी जीत की खुशी में धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है |

राजा हिमा के पुत्र से जुडी कथा:-

राजा हिमा के बड़े बेटे के बारे में भविष्य वाणी हुई थी की वह अपने शादी के चौथे दिन एक सांप के काटने से मर जाएगा। उसकी शादी के चौथे दिन उसकी पत्नी ने कमरे और दरवाजे पर सोने चांदी के सिक्के रख दिये |

पूरे घर को दिये से सजा दिया। अपने पति को सुलाने के लिए कहानियां और गाने गाने लगी | जब यम देवता सांप के रूप में आए तो सिक्के और दिये की तेज रोशनी से अंदर नहीं जा सके बाहर बैठ कर गाने सुनते रहे और सुबह होते ही चले गए | इसलिए ये धनतेरस मनाई जाती है |

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